*तबादला नीति बेअसर! छिंदवाड़ा में वर्षों से एक ही कुर्सी पर जमे अधिकारी-कर्मचारी, भ्रष्टाचार और राजनीतिक संरक्षण पर उठ रहे सवाल*
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*-:राजेंद्र अग्रवाल, छिंदवाड़ा की कलम से*
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छिंदवाड़ा। मध्यप्रदेश सरकार प्रशासनिक व्यवस्था को पारदर्शी, जवाबदेह और जनहितैषी बनाने के उद्देश्य से समय-समय पर तबादला नीति लागू करती है। लेकिन छिंदवाड़ा जिले में इस नीति का असर कई विभागों में दिखाई नहीं दे रहा है। वर्षों से एक ही स्थान पर जमे अधिकारी और कर्मचारी अब जनचर्चा का विषय बन चुके हैं।
सूत्रों और विभागीय जानकारियों के अनुसार जिले के कई विभागों में ऐसे अधिकारी-कर्मचारी हैं जो 10 से 15 वर्ष अथवा उससे भी अधिक समय से एक ही स्थान पर पदस्थ हैं। लंबे समय तक एक ही स्थान पर पदस्थ रहने के कारण प्रभाव, संपर्क और नेटवर्क इतना मजबूत हो जाता है कि आम जनता के लिए निष्पक्ष प्रशासन की उम्मीद कमजोर पड़ने लगती है।
*जनता की सबसे बड़ी शिकायत – अधिकारी मिलते ही नहीं*
ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों से लगातार शिकायतें सामने आती हैं कि कई कार्यालयों में अधिकारी अपनी कुर्सी पर समय पर नहीं मिलते। फरियादी घंटों इंतजार करते हैं, कई-कई चक्कर लगाने पड़ते हैं, लेकिन काम समय पर नहीं हो पाता। आम नागरिकों का कहना है कि कार्यालयों में जनता की समस्याओं से अधिक व्यक्तिगत प्रभाव और रसूख का महत्व दिखाई देता है।
*नियम-कानून केवल जनता के लिए?*
कई फरियादियों का आरोप है कि छोटे-छोटे कार्यों के लिए नियमों और प्रक्रियाओं का हवाला देकर उन्हें महीनों तक भटकाया जाता है। वहीं प्रभावशाली लोगों के कार्य अपेक्षाकृत शीघ्र हो जाते हैं। इससे आम नागरिकों के मन में व्यवस्था के प्रति असंतोष बढ़ रहा है।
*अभद्र व्यवहार और सत्ता जैसा रवैया*
जनता के बीच यह भी शिकायत सुनने को मिलती है कि कुछ अधिकारी-कर्मचारी आम नागरिकों से सम्मानजनक व्यवहार नहीं करते। फरियाद लेकर पहुंचने वाले लोगों को डांटना, फटकारना और उनकी समस्याओं को गंभीरता से न लेना प्रशासनिक संवेदनशीलता पर सवाल खड़े करता है। कई स्थानों पर अधिकारी स्वयं को जनसेवक के बजाय शासक की भूमिका में प्रस्तुत करते दिखाई देते हैं।
*सरकारी संसाधनों के दुरुपयोग की चर्चाएं*
जनचर्चाओं में यह भी आरोप लगाए जाते हैं कि कुछ स्थानों पर सरकारी वाहनों और संसाधनों का उपयोग निर्धारित नियमों के अनुरूप नहीं हो रहा है। यदि इन चर्चाओं में सत्यता है तो यह सरकारी धन और संसाधनों के उपयोग की निगरानी पर भी गंभीर प्रश्न खड़े करता है।
*यूनियन और राजनीतिक संरक्षण का कवच?*
कर्मचारियों और अधिकारियों के बीच यह धारणा भी बनी हुई है कि कुछ लोग यूनियन शक्ति या राजनीतिक संरक्षण के कारण वर्षों तक स्थानांतरण से बच जाते हैं। स्थानीय स्तर पर नेताओं से निकटता बनाए रखने और राजनीतिक संपर्कों का लाभ लेने की चर्चाएं भी समय-समय पर सामने आती रहती हैं। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र जांच और पुष्टि आवश्यक है।
*जनता का काम रुके, तो सरकार की छवि भी प्रभावित होती है*
प्रशासनिक व्यवस्था सरकार का चेहरा होती है। यदि जनता के कार्य समय पर नहीं होते, अधिकारी उपलब्ध नहीं रहते और शिकायतों का समाधान नहीं होता, तो जनता का आक्रोश सीधे शासन और सरकार के प्रति बढ़ता है। ऐसे में वर्षों से जमी हुई व्यवस्थाएं अनजाने में सरकार की जनहितकारी योजनाओं और छवि को भी नुकसान पहुंचा सकती हैं।
*बड़ा सवाल: आखिर कार्रवाई कब?*
जब सरकार ने स्पष्ट तबादला नीति बना रखी है, तो वर्षों से एक ही स्थान पर जमे अधिकारियों और कर्मचारियों की समीक्षा क्यों नहीं होती? क्या नियम सभी के लिए समान हैं? क्या राजनीतिक और प्रशासनिक प्रभाव के कारण कुछ लोगों को विशेष छूट मिल रही है? या फिर निगरानी तंत्र कमजोर पड़ चुका है?
आज आवश्यकता इस बात की है कि सभी विभागों में निष्पक्ष समीक्षा कर वर्षों से एक ही स्थान पर पदस्थ अधिकारियों और कर्मचारियों की सूची सार्वजनिक की जाए तथा नियमों के अनुसार कार्रवाई सुनिश्चित की जाए। तभी प्रशासनिक पारदर्शिता, जवाबदेही और जनता का विश्वास मजबूत हो सकेगा।
— *राजेंद्र अग्रवाल*
*छिंदवाड़ा की कलम से* ✍️📰

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