2026 मक्का समझौता: इस्लामिक नाटो की दस्तक या बदलती पश्चिम एशियाई शक्ति-समीकरण की नई पटकथा?
लेखक: कर्नल (डॉ.) देव आनंद लोहामारोड़
रक्षा एवं सुरक्षा मामलों के विशेषज्ञ
7 अगस्त 2026 को मक्का में सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किये के बीच हुआ त्रिपक्षीय रक्षा समझौता पश्चिम एशिया की बदलती सुरक्षा व्यवस्था में एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हो सकता है। समझौते का सबसे महत्वपूर्ण प्रावधान यह है कि तीनों में से किसी एक देश पर सशस्त्र हमला तीनों देशों पर हमला माना जाएगा। यह प्रावधान तत्काल नाटो के सामूहिक रक्षा सिद्धांत की याद दिलाता है और इसी कारण कुछ विश्लेषक इसे “इस्लामिक नाटो” या “सुन्नी नाटो” की शुरुआत के रूप में देख रहे हैं। हालांकि, ऐसा निष्कर्ष अभी जल्दबाजी होगा। नाटो के विपरीत मक्का समझौते में अभी स्थायी संयुक्त सैन्य कमान, साझा सैन्य बजट, स्थापित संस्थागत तंत्र या अनुच्छेद 5 जैसी स्पष्ट बाध्यकारी व्यवस्था नहीं है। फिलहाल इसे एक उभरते सामूहिक सुरक्षा ढांचे के रूप में समझना अधिक उचित होगा, जिसका भविष्य का प्रभाव पश्चिम एशिया से कहीं आगे तक जा सकता है।
यह समझौता अचानक अस्तित्व में नहीं आया है। 17 सितंबर 2025 को सऊदी अरब और पाकिस्तान ने रियाद में रणनीतिक पारस्परिक रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए थे, जिसके तहत एक देश के विरुद्ध आक्रमण को दोनों के विरुद्ध आक्रमण माना जाना था। इसलिए नए त्रिपक्षीय समझौते को पहले से विकसित हो रहे सऊदी–पाकिस्तान सुरक्षा ढांचे के विस्तार के रूप में देखा जा सकता है। इस ढांचे के तहत पाकिस्तान की सैन्य तैनाती और विमानों की सऊदी अरब में मौजूदगी ने भी संकेत दिया कि दोनों देशों के संबंध राजनीतिक घोषणाओं से आगे बढ़कर व्यावहारिक रक्षा सहयोग की दिशा में जा रहे हैं। अब तुर्किये के शामिल होने से इस व्यवस्था को नया भौगोलिक, तकनीकी और सैन्य आयाम मिल गया है।
तीनों देशों के रणनीतिक हित अलग-अलग हैं, लेकिन कई क्षेत्रों में उनका मेल बढ़ रहा है। सऊदी अरब के पास विशाल आर्थिक संसाधन हैं, लेकिन उसकी सुरक्षा व्यवस्था लंबे समय से अमेरिकी सुरक्षा सहयोग और रक्षा तकनीक पर काफी निर्भर रही है। मिसाइल और ड्रोन खतरे, समुद्री असुरक्षा तथा ऊर्जा अवसंरचना पर हमलों के जोखिम ने रियाद को अधिक रणनीतिक स्वायत्तता और अपने सुरक्षा साझेदारों में विविधता लाने के लिए प्रेरित किया है। पाकिस्तान सैन्य जनशक्ति, परिचालन अनुभव और परमाणु प्रतिरोध क्षमता प्रदान कर सकता है, जबकि सऊदी अरब आर्थिक संसाधन, निवेश और रक्षा वित्त उपलब्ध करा सकता है। तुर्किये उन्नत रक्षा तकनीक, ड्रोन, मिसाइल, नौसैनिक प्रणालियाँ और तेजी से विकसित हो रहा स्वदेशी रक्षा उद्योग लेकर आता है।
तुर्किये के लिए यह समझौता रक्षा निर्यात बढ़ाने और पश्चिम एशिया तथा व्यापक मुस्लिम जगत में अपना प्रभाव मजबूत करने का अवसर है। अंकारा नाटो का सदस्य है, लेकिन उसने रूस, ईरान और अन्य शक्तियों के साथ संबंध बनाए रखते हुए अपनी स्वतंत्र क्षेत्रीय रणनीति भी विकसित की है तथा खाड़ी देशों और पाकिस्तान के साथ संबंध मजबूत किए हैं। सऊदी अरब और पाकिस्तान के साथ सहयोग तुर्किये को एक महत्वपूर्ण रक्षा-तकनीकी प्रदाता के रूप में मजबूत कर सकता है। पाकिस्तान के लिए भी इसका रणनीतिक लाभ महत्वपूर्ण है। वह सऊदी आर्थिक शक्ति को तुर्किये की रक्षा तकनीक से जोड़कर दक्षिण एशिया से बाहर एक महत्वपूर्ण सैन्य शक्ति के रूप में अपनी भूमिका मजबूत करने का प्रयास कर सकता है।
लेकिन क्या यह वास्तव में “सुन्नी नाटो” है? फिलहाल इसका उत्तर नहीं है। नाटो दशकों में विकसित हुआ एक अत्यधिक संस्थागत सैन्य गठबंधन है, जिसके पास स्थायी कमान संरचना, व्यापक सैन्य योजना और सामूहिक कार्रवाई के स्थापित तंत्र हैं। मक्का समझौता अभी तीन देशों का नया ढांचा है, जिसकी वास्तविक सैन्य प्रतिबद्धताओं की परीक्षा नहीं हुई है। इसकी वास्तविक शक्ति तभी सामने आएगी जब किसी एक सदस्य को गंभीर सैन्य संकट का सामना करना पड़े और अन्य दो देशों को यह निर्णय लेना हो कि वे केवल कूटनीतिक समर्थन देंगे या खुफिया जानकारी, हथियार, रसद अथवा प्रत्यक्ष सैन्य हस्तक्षेप तक जाएंगे।
ईरान क्षेत्रीय सुरक्षा समीकरण का महत्वपूर्ण कारक है, लेकिन इस समझौते की एकमात्र वजह नहीं है। सऊदी अरब ईरान की मिसाइल और ड्रोन क्षमताओं, समुद्री सुरक्षा तथा ईरान से जुड़े सशस्त्र समूहों की गतिविधियों को लेकर चिंतित है। इजरायल–ईरान संघर्ष तथा गाजा, लेबनान और सीरिया से जुड़ी अस्थिरता ने क्षेत्रीय वातावरण को और जटिल बनाया है। लेकिन तुर्किये और पाकिस्तान के ईरान के साथ संबंध सीधे टकराव वाले नहीं हैं। पाकिस्तान की सीमा ईरान से लगती है, जबकि तुर्किये के तेहरान के साथ आर्थिक और रणनीतिक संबंध हैं। इसलिए मक्का समझौते को केवल ईरान-विरोधी गठबंधन कहना उचित नहीं होगा।
इसके बावजूद समझौते के धार्मिक आयाम को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। समझौते पर मक्का में हस्ताक्षर हुए और तीनों देश सुन्नी बहुल हैं, जबकि ईरान मुख्यतः शिया बहुल है। इससे एक पंथीय पृष्ठभूमि स्वतः बनती है। लेकिन समझौते का आधिकारिक जोर सामूहिक रक्षा और रणनीतिक सहयोग पर है, धार्मिक संघर्ष पर नहीं। इसलिए इसे स्वतः सुन्नी बनाम शिया सैन्य गुट मानना उचित नहीं होगा। आर्थिक हित, क्षेत्रीय सुरक्षा, समुद्री स्थिरता, रक्षा तकनीक और रणनीतिक स्वायत्तता की आवश्यकता भी इसके प्रमुख कारण हैं।
57 सदस्य देशों वाले इस्लामिक सहयोग संगठन (OIC) के राजनीतिक और पंथीय हित अत्यंत विविध हैं। इसलिए एक एकीकृत “इस्लामिक सैन्य गठबंधन” का निर्माण आसान नहीं होगा। ईरान की रणनीतिक गणनाएँ सऊदी अरब से अलग हैं और कई अन्य मुस्लिम बहुल देश भी किसी कठोर सैन्य गुट में शामिल होने से बचना चाहेंगे। मक्का ढांचे का भविष्य में विस्तार इस बात पर निर्भर करेगा कि तीनों संस्थापक देश अपने अलग-अलग हितों के बीच कितना सामंजस्य स्थापित कर पाते हैं।
इजरायल भी इस समीकरण का महत्वपूर्ण पक्ष है। गाजा संघर्ष और फिलिस्तीनी मुद्दे के कारण सऊदी अरब के इजरायल के साथ संबंध जटिल हुए हैं। तुर्किये ने इजरायली नीतियों के प्रति कड़ा रुख अपनाया है, जबकि पाकिस्तान के इजरायल के साथ राजनयिक संबंध नहीं हैं। हालांकि इसका अर्थ यह नहीं है कि मक्का समझौता इजरायल-विरोधी गठबंधन है। लेकिन यह पहले से जटिल क्षेत्रीय शक्ति-संतुलन में एक नया रणनीतिक तत्व अवश्य जोड़ता है। इजरायल को विशेष रूप से ड्रोन, मिसाइल, खुफिया सहयोग और क्षेत्रीय रक्षा क्षमताओं में सऊदी–तुर्किये–पाकिस्तान सहयोग के संभावित विकास पर नजर रखनी होगी।
अमेरिका के लिए यह समझौता अवसर और रणनीतिक चुनौती दोनों है। यदि क्षेत्रीय शक्तियाँ अपनी सुरक्षा की अधिक जिम्मेदारी स्वयं उठाती हैं तो वाशिंगटन इसे उपयोगी बोझ-साझेदारी के रूप में देख सकता है। लेकिन यदि यह व्यवस्था धीरे-धीरे अमेरिकी सुरक्षा ढांचे से स्वतंत्र सैन्य संरचना का रूप लेती है, तो इससे पश्चिम एशिया में अमेरिकी प्रभाव को चुनौती मिल सकती है। सऊदी अरब अमेरिका का महत्वपूर्ण सुरक्षा साझेदार है और तुर्किये नाटो का सदस्य है। इसलिए अमेरिका इस व्यवस्था के विकास को नजरअंदाज नहीं कर सकता।
भारत के लिए इसका प्रभाव विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि पाकिस्तान इस त्रिपक्षीय व्यवस्था के संस्थापक सदस्यों में है। सऊदी आर्थिक सहयोग और तुर्किये की रक्षा तकनीक पाकिस्तान की सैन्य क्षमता को मजबूत कर सकती है। ड्रोन, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध, नौसैनिक प्रणालियों, खुफिया सहयोग और सैन्य प्रशिक्षण में बढ़ता सहयोग दक्षिण एशिया के रणनीतिक संतुलन को प्रभावित कर सकता है। हालांकि यह मान लेना गलत होगा कि भारत के साथ किसी संघर्ष में सऊदी अरब या तुर्किये स्वतः पाकिस्तान का समर्थन करेंगे। सऊदी अरब के भारत के साथ ऊर्जा, निवेश, व्यापार और प्रवासी भारतीयों से जुड़े व्यापक संबंध हैं और उसने परंपरागत रूप से पाकिस्तान के साथ अपने संबंधों को नई दिल्ली के साथ संबंधों से अलग रखा है।
भारत को इसलिए घबराहट के बजाय रणनीतिक पूर्वानुमान के साथ प्रतिक्रिया देनी चाहिए। नई दिल्ली को सऊदी अरब के साथ संबंध और मजबूत करने के साथ-साथ तुर्किये–पाकिस्तान रक्षा सहयोग पर करीबी नजर रखनी चाहिए। भारत को इजरायल, अमेरिका, फ्रांस, संयुक्त अरब अमीरात, मिस्र और अन्य क्षेत्रीय शक्तियों के साथ भी रणनीतिक साझेदारी मजबूत करनी चाहिए—किसी पाकिस्तान-विरोधी गुट के रूप में नहीं, बल्कि स्वतंत्र और पारस्परिक हितों पर आधारित साझेदारियों के नेटवर्क के रूप में। ड्रोन, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध, मिसाइल रक्षा, समुद्री निगरानी, खुफिया, अंतरिक्ष आधारित प्रणालियों और स्वदेशी रक्षा उत्पादन पर विशेष ध्यान देना होगा।
इस उभरते त्रिकोण की एक महत्वपूर्ण सीमा भी है। सऊदी अरब, तुर्किये और पाकिस्तान के रणनीतिक उद्देश्य पूरी तरह समान नहीं हैं। रियाद अमेरिका और वैश्विक अर्थव्यवस्था से गहराई से जुड़ा है; तुर्किये नाटो का सदस्य है और उसके पश्चिमी देशों से व्यापक आर्थिक एवं सुरक्षा संबंध हैं; जबकि पाकिस्तान गंभीर आर्थिक दबावों और बाहरी वित्तीय सहायता पर निर्भरता का सामना कर रहा है। इसलिए एक स्थायी और पूरी तरह एकीकृत सैन्य गुट बनाना कठिन होगा।
इसलिए 7 अगस्त 2026 का मक्का संयुक्त रक्षा समझौता एक सामान्य रक्षा समझौते से अधिक महत्वपूर्ण, लेकिन अभी पूर्ण विकसित “इस्लामिक नाटो” से कम है। यह सऊदी अरब की रणनीतिक स्वायत्तता की तलाश, तुर्किये की रक्षा-औद्योगिक महत्वाकांक्षा और पाकिस्तान की सैन्य एवं कूटनीतिक भूमिका बढ़ाने की कोशिशों के संगम को दर्शाता है। इसकी वास्तविक सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि तीनों देश राजनीतिक प्रतिबद्धताओं को कितनी प्रभावी परिचालन सैन्य साझेदारी में बदल पाते हैं।
भारत के लिए संदेश स्पष्ट है—पश्चिम एशिया और दक्षिण एशिया की सुरक्षा व्यवस्थाएँ तेजी से एक-दूसरे से जुड़ रही हैं। भारत को किसी कठोर सैन्य गुट में शामिल होने की आवश्यकता नहीं है। उसकी शक्ति रणनीतिक स्वायत्तता, बहु-संरेखीय कूटनीति और स्वदेशी रक्षा क्षमता में है। नई दिल्ली को सऊदी अरब के साथ संबंध मजबूत करने, तुर्किये–पाकिस्तान सैन्य सहयोग पर सतर्क नजर रखने, अमेरिका और इजरायल सहित प्रमुख साझेदारों के साथ संबंध बनाए रखने तथा अपनी तकनीकी और रक्षा-औद्योगिक क्षमता को तेजी से बढ़ाने की आवश्यकता है।
मक्का समझौता अभी “इस्लामिक नाटो” नहीं है, लेकिन यह एक नई क्षेत्रीय सुरक्षा व्यवस्था का पहला बड़ा संकेत बन सकता है। इसका विकास खाड़ी से लेकर दक्षिण एशिया तक शक्ति-संतुलन को प्रभावित कर सकता है। इसलिए भारत को इस उभरती व्यवस्था को शुरुआती चरण में ही समझकर उसके संभावित रणनीतिक परिणामों के लिए तैयार रहना होगा।
Priyanka Mali state head Rajasthan
