भारत की जीरो-टॉलरेंस नीति: आतंकवाद पर बनता नया वैश्विक मानक....

कर्नल देव आनंद लोहमारोर राष्ट्रीय अध्यक्ष, भूतपूर्व सैनिक विकास समिति एवं शहीद सम्मान समिति

पहलगाम आतंकी हमले की कड़ी निंदा से लेकर आतंकवाद के वित्तपोषण, सीमा-पार आतंकवाद और सुरक्षित पनाहगाहों के खिलाफ सामूहिक कार्रवाई तक, नई दिल्ली BRICS घोषणापत्र भारत की लंबे समय से चली आ रही आतंकवाद पर जीरो-टॉलरेंस नीति के लिए एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक उपलब्धि है। इससे भी महत्वपूर्ण यह है कि यह संकेत देता है कि आतंकवाद के खिलाफ बिना किसी अपवाद और दोहरे मानदंड के कार्रवाई को लेकर अंतरराष्ट्रीय सहमति उभर रही है।

18वें BRICS शिखर सम्मेलन की भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि आतंकवाद के मुद्दे पर सामने आई। 2025 के रियो डी जेनेरियो शिखर सम्मेलन में बनी सहमति को आगे बढ़ाते हुए घोषणापत्र में 22 अप्रैल 2025 के पहलगाम आतंकी हमले की कड़ी निंदा की गई, जिसमें 26 लोगों की जान गई थी। BRICS देशों ने आतंकवाद के सभी रूपों और अभिव्यक्तियों के प्रति “जीरो-टॉलरेंस” की प्रतिबद्धता दोहराते हुए स्पष्ट किया कि धर्म, राष्ट्रीयता, सभ्यता या जातीय पहचान के नाम पर आतंकवाद को उचित नहीं ठहराया जा सकता। यह भारत के लगातार कायम रुख की महत्वपूर्ण बहुपक्षीय स्वीकृति है।

घोषणापत्र पहलगाम की निंदा से आगे बढ़ता है। इसमें आतंकवाद का वित्तपोषण, आतंकवादियों की सीमा-पार आवाजाही, सुरक्षित पनाहगाह और आतंकवादियों तथा उनके समर्थकों की जवाबदेही पर जोर दिया गया है। साथ ही अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद पर व्यापक अभिसमय (CCIT) को शीघ्र अंतिम रूप देकर अपनाने का आह्वान किया गया है, जिसकी मांग भारत 1996 से संयुक्त राष्ट्र में करता रहा है। BRICS के आतंकवाद-रोधी कार्य समूह की भूमिका को भी मजबूत किया गया है। संयुक्त राष्ट्र द्वारा नामित आतंकवादियों और आतंकी संगठनों के खिलाफ समन्वित कार्रवाई का आह्वान इस ढांचे को और मजबूत करता है।

व्यापक रणनीतिक संदर्भ में घोषणापत्र एक नए अंतरराष्ट्रीय सिद्धांत की ओर संकेत करता है—किसी भी देश को सशस्त्र परोक्ष संगठनों के माध्यम से भू-राजनीतिक उद्देश्य हासिल करने और उसके परिणामों की जिम्मेदारी से बचने की छूट नहीं होनी चाहिए। BRICS ने इस संदर्भ में किसी विशेष देश का नाम नहीं लिया है, लेकिन उसका संदेश उन सभी शक्तियों तक जाता है जो प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से गैर-राज्य सशस्त्र समूहों का समर्थन करती हैं।

विभिन्न क्षेत्रों में इसके अलग-अलग उदाहरण हैं—ईरान (हिज्बुल्लाह, हमास और हौथी), रूस (वैगनर समूह/अफ्रीका कॉर्प्स), तुर्किये (सीरियन नेशनल आर्मी), संयुक्त अरब अमीरात (सदर्न ट्रांजिशनल काउंसिल और रैपिड सपोर्ट फोर्सेज), रवांडा (M23), कतर (विभिन्न क्षेत्रीय इस्लामी गुट), अमेरिका (सीरियन डेमोक्रेटिक फोर्सेज और ऐतिहासिक रूप से कॉन्ट्राज), चीन (यूनाइटेड वा स्टेट आर्मी और म्यांमार सीमा के सशस्त्र समूह) तथा पाकिस्तान (लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद)। इन संबंधों की कानूनी स्थिति, राजनीतिक संदर्भ और उपलब्ध प्रमाण अलग-अलग हैं और इन सभी संगठनों को एक ही श्रेणी में रखना उचित नहीं होगा। फिर भी सिद्धांत सार्वभौमिक होना चाहिए—जो भी हिंसक समूहों को धन, हथियार, प्रशिक्षण, सुविधा या सुरक्षित पनाह उपलब्ध कराते हैं, वे अंतरराष्ट्रीय जांच और जवाबदेही से बाहर नहीं रह सकते।

इससे आतंकवाद-विरोधी लड़ाई का केंद्र केवल हमले के बाद हमलावरों को खत्म करने से आगे बढ़कर उन व्यापक वित्तीय, सैन्य और रसद तंत्रों को समाप्त करने की ओर जाता है जो आतंकवाद को बनाए रखते हैं। भारत लगातार यह मानता रहा है कि आतंकवाद को उसके समर्थन और सक्षम बनाने वाले नेटवर्क से अलग नहीं किया जा सकता। BRICS घोषणापत्र इस दृष्टिकोण को बहुपक्षीय स्तर पर अधिक मजबूती देता है।

घोषणापत्र में पाकिस्तान का स्पष्ट नाम नहीं है और न ही उसे औपचारिक रूप से अलग-थलग करने की घोषणा की गई है। लेकिन पहलगाम की कड़ी निंदा तथा सीमा-पार आतंकवाद, आतंकवादी वित्तपोषण और सुरक्षित पनाहगाहों पर जोर भारत की प्रमुख सुरक्षा चिंताओं को सीधे प्रतिबिंबित करता है। विस्तारित BRICS समूह द्वारा इस भाषा की सामूहिक स्वीकृति भारत के लंबे समय से चले आ रहे सिद्धांत को मजबूत करती है—आतंकवाद करने वालों के साथ-साथ उसका समर्थन, वित्तपोषण, सुविधा या संरक्षण करने वालों को भी जवाबदेही का सामना करना चाहिए।

इसी तरह BRICS द्वारा दोहरे मानदंडों को अस्वीकार करना भी महत्वपूर्ण है। “अच्छे” और “बुरे” परोक्ष संगठनों में अंतर करना वैश्विक आतंकवाद-रोधी ढांचे को कमजोर करता है। भारत का रुख इसलिए केवल राष्ट्रीय आत्मरक्षा तक सीमित नहीं है; आतंकवाद के खिलाफ देश, विचारधारा या भू-राजनीतिक हित से परे एक समान अंतरराष्ट्रीय मानदंड होना चाहिए। इस अर्थ में भारत की जीरो-टॉलरेंस नीति राष्ट्रीय सुरक्षा के रुख से आगे बढ़कर उभरते अंतरराष्ट्रीय मानक का रूप ले रही है।

आतंकवाद के अलावा भारत ने वैश्विक शासन और आर्थिक स्थिरता के मोर्चे पर भी महत्वपूर्ण उपलब्धियां हासिल कीं। BRICS ने संयुक्त राष्ट्र, जिसमें सुरक्षा परिषद भी शामिल है, में व्यापक सुधार और विकासशील देशों की अधिक भूमिका का समर्थन किया तथा भारत और ब्राजील की बड़ी भूमिका की आकांक्षा के प्रति समर्थन दोहराया। व्यापार के क्षेत्र में विश्व व्यापार संगठन को केंद्र में रखते हुए एकतरफा शुल्क और संरक्षणवाद का विरोध, वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं को हथियार न बनाने, स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और भुगतान को बढ़ावा देने तथा उभरती अर्थव्यवस्थाओं के अधिक न्यायपूर्ण प्रतिनिधित्व के लिए अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की 16वीं कोटा समीक्षा को लागू करने का समर्थन किया गया। पश्चिम एशिया में संवाद और संयम की अपील भारत की रणनीतिक स्वायत्तता तथा बहुध्रुवीय, नियम-आधारित और न्यायपूर्ण विश्व व्यवस्था की उसकी नीति को दर्शाती है।

नई दिल्ली BRICS शिखर सम्मेलन इसलिए केवल एक आतंकी हमले की निंदा तक सीमित नहीं है। इसने भारत की जीरो-टॉलरेंस नीति को व्यापक Global South सहमति से जोड़ा और एक स्पष्ट राजनीतिक दिशा प्रस्तुत की है—न परोक्ष संगठनों के पीछे छिपने की गुंजाइश, न सुरक्षित पनाहगाह और न आतंकवाद पर दोहरे मानदंड। यह किसी एक देश के खिलाफ औपचारिक प्रस्ताव नहीं है और न ही भारत को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की स्थायी सीट मिलने का निर्णय। लेकिन आतंकवाद जहां से भी उत्पन्न हो और जिस नेटवर्क से उसे धन, हथियार, प्रशिक्षण या संरक्षण मिले, वहां जवाबदेही तय होनी चाहिए। यही नई दिल्ली घोषणापत्र का गहरा संदेश और आतंकवाद पर भारत की जीरो-टॉलरेंस नीति की महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय स्वीकार्यता है।