सफलता की कहानी (सेवा-संकल्प अभियान)

हुनर से आई आत्मनिर्भरता ग्वालियर की ग्रामीण महिलाएं गढ़ रहीं बदलाव की नई इबारत

ग्वालियर 22 सितम्बर 2026/ कभी जिनकी पहचान सिर्फ घर की चारदीवारी तक सीमित थी, वही महिलाएं अब अपने हुनर, मेहनत और हौसले से परिवार की आर्थिक रीढ़ बन रही हैं। ग्वालियर जिले के गांवों में एक खामोश मगर मजबूत बदलाव आकार ले रहा है। ग्रामीण आजीविका मिशन का सहारा लेकर जिले की महिलाएं अपने सपनों को नई उड़ान दे रही हैं। आत्मनिर्भरता की एक प्रेरक मिसाल गढ़ रहीं महिलायें सही मायने में “सेवा-संकल्प अभियान” को सार्थक रूप दे रही हैं। स्व-सहायता समूहों की आजीविका गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन के माध्यम से अब तक लगभग 17 करोड़ रुपये की राशि समूहों को उपलब्ध कराई जा चुकी है। समूहों को नई गतिविधियां शुरू करने में सहयोग दिया जा रहा है, साथ ही उनके उत्पादों की बिक्री के लिए संभागीय ग्रामीण हाट बाजार में प्रदर्शनी और बिक्री की सुविधा भी दी जा रही है।

एक मिशन, हजारों कहानियां

जिला पंचायत ग्वालियर द्वारा ग्रामीण आजीविका मिशन से जिले में अब तक 5,220 स्व-सहायता समूह बनाए जा चुके हैं। इन समूहों से करीबन 56 हजार महिलाएं जुड़ी हैं। इनमें से लगभग 3,300 समूहों की महिलाएं झाड़ू निर्माण, रेडीमेड कपड़े, मोती की माला, रुई-बाती, मसाला, पापड़-बड़ी, साबुन, सेनेटरी नैपकिन और फिनाइल निर्माण जैसी गतिविधियों से जुड़कर हर महीने आय अर्जित कर रही हैं। कुछ समूह पारंपरिक खेती को छोड़कर उन्नत और जैविक खेती की ओर भी कदम बढ़ा चुके हैं, जिससे न केवल उनकी आय बढ़ी है बल्कि खेती के तरीके भी बेहतर हुए हैं। इसी तरह घाटीगांव के सोजना गांव की बिंदु गोस्वामी और उनकी साथी महिलाएं भी राखियों के साथ-साथ सजावटी सामग्री और आर्ट क्राफ्ट तैयार करती हैं, जिन्हें संभागीय ग्रामीण हाट बाजार की दुकानों में प्रदर्शित कर बिक्री के लिए रखा जाता है।

राखी के धागों में बुना रोजगार

रक्षाबंधन भाई-बहन के स्नेह का पर्व है, लेकिन ग्वालियर की ग्रामीण महिलाओं ने इस पावन बंधन को आत्मनिर्भरता की डोर से भी जोड़ दिया है। जनपद मुरार के हस्तिनापुर गांव की रजनी जेठवा, स्व-सहायता समूह 'रतनगढ़ बाली माता' की सदस्य हैं। उन्होंने समूह की अन्य महिलाओं के साथ मिलकर इस बार के रक्षाबंधन पर रंग-बिरंगी और आकर्षक डिज़ाइन की राखियां तैयार कीं। रजनी बताती हैं कि जब तैयार राखियां सीधे शहर की बड़ी दुकानों तक पहुंचती हैं, तो बिचौलिए कम होने से उन्हें अपनी मेहनत का बेहतर मूल्य मिलता है। इसी उद्देश्य से ग्रामीण हाट बाजार में जिला प्रशासन द्वारा इस बार राखी मेला लगवाया गया था। वहीं बंधोली गांव की सीमा शर्मा ने राखी बनाने के इस काम में अपने पूरे परिवार को जोड़ लिया। परिवार के सभी सदस्यों ने मिलकर राखियां तैयार कीं और रक्षाबंधन का यह सीजन उनके लिए अतिरिक्त आमदनी का सुनहरा अवसर लेकर आया।

हर त्योहार में छिपा आय का अवसर

इन महिलाओं ने यह सीख लिया है कि साल भर आने वाला हर त्योहार अपने साथ कमाई का एक नया मौका भी लाता है। होली पर समूह की महिलाओं ने हर्बल गुलाल तैयार कर बाजार में उतारा, तो दीपावली के लिए नमकीन, मठरी, देशी घी की मिठाई और पूजन सामग्री जैसे उत्पाद बनाए। यानी त्योहार अब इन महिलाओं के लिए सिर्फ उत्सव नहीं, बल्कि सुनियोजित आमदनी के अवसर बन चुके हैं। झाड़ू और साबुन बनाने से लेकर जैविक खेती तक, राखी और गुलाल से लेकर दीपावली की मिठाइयों तक ग्वालियर की ग्रामीण महिलाओं ने यह साबित कर दिया है कि हुनर को सही अवसर और सही बाजार मिले तो वह परिवार ही नहीं, पूरे गांव की तकदीर बदल सकता है।