खाकी पर भारी पड़ी बेबसी: सिंगरौली में स्पेशल ब्रांच के प्रधान आरक्षक ने दफ्तर में ही लगाई फांसी
सिंगरौली | मध्य प्रदेश के सिंगरौली जिले से पुलिस महकमे को झकझोर देने वाली बेहद दुखद घटना सामने आई है। कोतवाली थाना क्षेत्र स्थित विशेष शाखा (स्पेशल ब्रांच) में तैनात प्रधान आरक्षक राकेश गंगले ने संदिग्ध परिस्थितियों में कार्यालय के एक कमरे में पंखे से फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली। घटना के बाद से ही पुलिस महकमे में हड़कंप मचा हुआ है।
सुसाइड नोट में छलका दर्द: "परिवार से दूरी और ट्रांसफर न मिलना बनी वजह"
घटनास्थल से पुलिस को एक सुसाइड नोट भी बरामद हुआ है, जिसने पुलिस विभाग की कार्यप्रणाली और कर्मचारियों की मानसिक स्थिति पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
मूल रूप से खरगौन जिले के रहने वाले मृतक जवान राकेश गंगले ने सुसाइड नोट में लिखा:
1000 किमी की दूरी: सिंगरौली से उनका गृह जिला खरगोन लगभग 1000 किलोमीटर दूर है।
अत्यधिक मानसिक तनाव: लंबे समय तक अपनों से दूर रहने के कारण वे गंभीर मानसिक तनाव से गुजर रहे थे।
अनसुनी हुई गुहार: उन्होंने गृह जिले या आसपास के क्षेत्र में तबादले (Transfer) के लिए कई बार वरिष्ठ अधिकारियों से आवेदन कर गुहार लगाई थी, लेकिन विभाग द्वारा उनकी मांग पर कोई ध्यान नहीं दिया गया।
"सुसाइड नोट में मृतक जवान ने अपनी मौत का जिम्मेदार विभाग की उपेक्षा और ट्रांसफर न मिलने से उपजे तनाव को ठहराया है।"
मौके पर पहुंचा पुलिस और प्रशासनिक अमला
घटना की सूचना मिलते ही जिले के वरिष्ठ पुलिस अधिकारी और प्रशासनिक अमला तुरंत मौके पर पहुंचा।
पंचनामा कार्रवाई: तहसीलदार की मौजूदगी में नियमानुसार शव का पंचनामा तैयार कर उसे पंखे से नीचे उतारा गया।
पोस्टमार्टम: शव को एम्बुलेंस की मदद से पोस्टमार्टम के लिए जिला चिकित्सालय भेज दिया गया है।
परिजनों को सूचना: मृतक के परिजनों को घटना की जानकारी दे दी गई है, जिनके देर रात तक सिंगरौली पहुंचने की उम्मीद है।
पुलिस अधिकारियों का वक्तव्य
मामले की पुष्टि करते हुए नगर पुलिस अधीक्षक (सीएसपी) ललित बैरागी ने बताया:
"पुलिस ने मर्ग कायम कर लिया है। तहसीलदार की उपस्थिति में शव का पंचनामा कर पोस्टमार्टम के लिए भिजवाया गया है। सुसाइड नोट में उल्लेखित सभी बिंदुओं और आरोपों की बारीकी से जांच की जा रही है। परिजनों के आने के बाद आगे की वैधानिक कार्रवाई की जाएगी।"
विभागीय कार्यशैली पर खड़े हुए गंभीर सवाल
इस हृदयविदारक घटना ने एक बार फिर पुलिस कर्मियों में बढ़ रहे मानसिक दबाव, काम के बोझ और स्थानांतरण प्रक्रिया (Transfer Policy) से जुड़ी व्यावहारिक समस्याओं को बहस के केंद्र में ला खड़ा किया है। सवाल यह उठ रहा है कि जो पुलिस जवान दूसरों की सुरक्षा और न्याय के लिए तैनात रहते हैं, आखिर उनकी खुद की बेबसी और मानसिक तनाव की सुध लेने वाला कोई क्यों नहीं है?
