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Dharmendra Singh

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May 14, 2026

सच दिखाने की हिम्मत

कटनी रेलवे ठेका कंपनी की खुली मनमानी, 12 घंटे पसीना बहाने के बाद भी मजदूरों की जेब खाली!
कटनी। रेलवे जंक्शन और मुड़वारा स्टेशन पर व्यवस्थाएं संभालने का दावा करने वाली ठेका कंपनियां अब मजदूरों के शोषण का अड्डा बन चुकी हैं। ताजा मामला कटनी जंक्शन और मुड़वारा क्षेत्र से सामने आया है, जहाँ करीब 60 मजदूरों के हक पर डाका डाला जा रहा है। आरोप है कि ठेका कंपनी न सिर्फ श्रम कानूनों की धज्जियां उड़ा रही है, बल्कि आवाज उठाने पर मजदूरों को नौकरी से निकालने की धमकी भी दी जा रही है।

शोषण का खेल: 12 घंटे ड्यूटी और कौड़ियों में दाम
सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, कटनी जंक्शन और मुड़वारा में तैनात इन 60 कर्मचारियों (30 जंक्शन, 30 मुड़वारा) से दिन-रात मिलाकर 12-12 घंटे की कड़ी मशक्कत कराई जा रही है। हैरानी की बात यह है कि इतनी मेहनत के बाद भी उन्हें मिलने वाला वेतन न्यूनतम मजदूरी के मानक से भी कोसों दूर है।

वादा: शुरुआत में मैनेजर अजहर खान और ठेकेदार मिराज खान द्वारा अच्छे वेतन और सुविधाओं का सब्जबाग दिखाया गया था।
हकीकत: मात्र ₹6500 प्रतिमाह तय किया गया, जिसमें से भी PF के नाम पर ₹1000 से ₹1500 तक की मनमानी कटौती की जा रही है। मजदूरों का कहना है कि उन्हें ₹300 प्रतिदिन की मजदूरी भी नसीब नहीं हो रही।

धमकी और दबाव की राजनीति
जब मजदूरों ने इस आर्थिक शोषण के खिलाफ आवाज उठानी चाही, तो सुपरवाइजर रवि बंसल और महेश विश्वकर्मा के माध्यम से उन्हें दबाने की कोशिश की गई। कर्मचारियों का आरोप है कि उन्हें सीधे तौर पर काम से बाहर करने की धमकी दी जा रही है। यह स्थिति सीधे तौर पर प्रशासनिक मिलीभगत या ठेकेदार की भारी लापरवाही की ओर इशारा करती है।

प्रशासन की चुप्पी पर सवाल…..?
यह मामला केवल वेतन कटौती का नहीं, बल्कि मानव अधिकारों के हनन का है। 12 घंटे की शिफ्ट और मात्र ₹50006000 का भुगतान किस कानून के तहत जायज है? ‘भारत दिनभर’ की पड़ताल में यह साफ हुआ है कि ठेका व्यवस्था की आड़ में भ्रष्टाचार और शोषण का एक बड़ा नेक्सस काम कर रहा है।

मजदूरों की मांग:
ठेका कंपनी के रिकॉर्ड और PF कटौती की तत्काल ऑडिट हो।
12 घंटे की ड्यूटी को श्रम नियमों के तहत 8 घंटे किया जाए या अतिरिक्त मानदेय मिले।
धमकी देने वाले जिम्मेदारों पर सख्त कानूनी कार्रवाई हो।
अब देखना यह है कि कटनी का जिला प्रशासन और रेल प्रबंधन इन बेबस मजदूरों को न्याय दिला पाता है या ठेकेदार की ‘मनमानी’ इसी तरह चलती रहेगी।