हर घर तिरंगा से पहले कश्मीर की सरहदों पर लहराया था तिरंगा…
लेखक: चौधरी नजीर पॉड
यूथ प्रेसिडेंट, जम्मू-कश्मीर
इंटरनेशनल गुर्जर महासभा (IGM)…
आज जब पूरा देश ‘हर घर तिरंगा’ अभियान के माध्यम से राष्ट्रध्वज के प्रति अपने सम्मान और राष्ट्रभक्ति की भावना को अभिव्यक्त कर रहा है, तब कुछ वर्ष पीछे मुड़कर कश्मीर की उन पहाड़ियों और सीमावर्ती गांवों को याद करना भी जरूरी है, जहां तिरंगे को घर-घर तक पहुंचाने की एक जमीनी यात्रा बहुत पहले शुरू हो चुकी थी। यह किसी सरकारी अभियान के श्रेय का दावा नहीं, बल्कि उस अनलिखे इतिहास का स्मरण है, जिसमें राष्ट्रध्वज को सामान्य नागरिक के घर तक पहुंचाने के लिए सीमावर्ती क्षेत्रों में समर्पित भाव से काम किया गया।
मैं उस समय इंटरनेशनल गुर्जर महासभा में कर्नल देव आनंद लोहमरोड़ (गुर्जर) के साथ इस पूरे अभियान का प्रत्यक्ष सहभागी रहा हूं। इसलिए यह मेरे लिए केवल सुनी-सुनाई कहानी नहीं, बल्कि उन यात्राओं, मुलाकातों, कार्यक्रमों और अनुभवों की जीवंत स्मृति है, जिन्हें हमने स्वयं अपनी आंखों से देखा और अपने हाथों से जमीन पर उतारा।
वर्ष 2018 से इंटरनेशनल गुर्जर महासभा ने जम्मू-कश्मीर में गुर्जर-बकरवाल समाज के बीच सामाजिक जागरूकता, राष्ट्रीय एकता और राष्ट्रभक्ति से जुड़े कार्यक्रमों को व्यापक रूप देना शुरू किया। हमारा दृढ़ विश्वास था कि कश्मीर के सीमावर्ती क्षेत्रों में रहने वाला गुर्जर-बकरवाल समाज भारत की राष्ट्रीय मुख्यधारा का अभिन्न अंग है और उसकी देशभक्ति को किसी प्रमाणपत्र की आवश्यकता नहीं है। उस समय कश्मीर आतंकवाद और अलगाववाद की गंभीर चुनौतियों से गुजर रहा था। राष्ट्रध्वज को लेकर भी अनेक राजनीतिक बयान सामने आते थे। कुछ लोग तो यहां तक कहते थे कि कश्मीर में तिरंगा उठाने वाला कोई कंधा नहीं मिलेगा। हमने इन दावों का उत्तर किसी राजनीतिक बहस के माध्यम से नहीं, बल्कि गांवों की धरती पर जाकर देने का निर्णय लिया।
कर्नल देव आनंद लोहमरोड़ भारतीय सेना से सेवानिवृत्त अधिकारी थे। उनके लिए तिरंगा केवल एक कपड़ा या राष्ट्रीय प्रतीक नहीं था; वह सैनिक जीवन की शपथ, सर्वोच्च बलिदान और राष्ट्र के प्रति कर्तव्य का प्रतीक था। दूसरी ओर, गुर्जर-बकरवाल समाज की जमीनी पहुंच कश्मीर के दुर्गम और सीमावर्ती क्षेत्रों तक थी। यही सेना की राष्ट्रीय भावना और समाज की जमीनी पहुंच का संयोजन हमारे अभियान की सबसे बड़ी ताकत बना। हम कुपवाड़ा, करनाह, तंगधार, बंगस, साधना पास, उड़ी, बारामूला, बांदीपोरा, पहलगाम, अनंतनाग, बनिहाल और जम्मू जैसे क्षेत्रों तक पहुंचे। गांवों में लोगों से संवाद किया, युवाओं को जोड़ा और उन्हें बताया कि तिरंगा किसी राजनीतिक दल का नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र का ध्वज है।
वर्ष 2021 इस अभियान का एक महत्वपूर्ण पड़ाव बना। उस समय श्रीनगर स्थित सब एरिया के जीओसी मेजर जनरल एस.पी.एस. विश्वासराव महत्वपूर्ण सैन्य जिम्मेदारी संभाल रहे थे। कर्नल देव आनंद लोहमरोड़ से उनकी मुलाकात हुई। दोनों सैन्य पृष्ठभूमि से थे, इसलिए बातचीत में सीमावर्ती क्षेत्रों और गुर्जर-बकरवाल समाज की राष्ट्रभक्ति का विषय प्रमुखता से सामने आया। मेजर जनरल विश्वासराव साहब ने तिरंगे को अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाने और सीमावर्ती गांवों में लोगों को अपने घरों पर राष्ट्रध्वज फहराने के लिए प्रेरित करने में सहयोग दिया। उनके साथ-साथ उस समय जम्मू-कश्मीर में तैनात सेना के वरिष्ठ कमांडरों और सैन्य अधिकारियों का मार्गदर्शन व सहयोग भी इस पूरे अभियान को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण रहा।
कर्नल देव आनंद लोहमरोड़ ने इस जिम्मेदारी को सहर्ष स्वीकार किया और इंटरनेशनल गुर्जर महासभा की पूरी टीम इस अभियान में दिन-रात जुट गई। इतने बड़े अभियान के लिए हजारों तिरंगे खरीदना हमारे संगठन के सीमित संसाधनों में संभव नहीं था। सैन्य स्तर से बड़ी संख्या में तिरंगे उपलब्ध कराए गए और इसके बाद महासभा की टीम ने उन्हें कश्मीर के दुर्गम और सीमावर्ती क्षेत्रों तक पहुंचाने का जिम्मा संभाला। यह केवल एक दिन का कार्यक्रम नहीं था; कई महीनों तक अलग-अलग इलाकों में जाकर लोगों से संपर्क साधा गया। गांवों में तिरंगे पहुंचाए गए और लोगों को अपने घरों पर उन्हें सम्मानपूर्वक फहराने के लिए प्रेरित किया गया। हमारे लिए यह केवल झंडे बांटने का अभियान नहीं था, बल्कि जन-विश्वास निर्माण और राष्ट्रीय एकता का एक महायज्ञ था।
इस पूरी यात्रा में संगठन के अनेक साथियों का योगदान अविस्मरणीय रहा। दिवंगत चौधरी सलाउद्दीन साहब ने कश्मीर में संगठन के संगठनात्मक विस्तार और जमीनी गतिविधियों में ऐतिहासिक भूमिका निभाई। आज वे हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन हमारी हर स्मृति में उनका योगदान दर्ज है। तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष डॉ. यूनुस चौधरी ने संगठनात्मक स्तर पर अभियान को अद्भुत मजबूती दी, जबकि प्रदेश महिला अध्यक्ष चौधरी साजिया गुर्जर ने महिलाओं और परिवारों के बीच राष्ट्रध्वज के प्रति सम्मान और राष्ट्रीय एकता की भावना को पहुंचाने में सराहनीय योगदान दिया। इसके अलावा श्रीनगर के फकीर गुजरी के सरपंच सहित अनेक स्थानीय कार्यकर्ताओं ने गांव-गांव तक लोगों को जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
23 अगस्त 2021 को बंगस घाटी में आयोजित महासभा के कार्यक्रम में 500 से अधिक स्थानीय नागरिकों ने भाग लिया और पूरी घाटी “भारत माता की जय” के उद्घोष से गुंजायमान हो उठी। उस दिन हमने महसूस किया कि तिरंगे के प्रति सम्मान और राष्ट्र के प्रति भावना किसी राजनीतिक भाषण की मोहताज नहीं है; वह भावना उन लोगों के दिलों में पहले से मौजूद थी, जिसे केवल विश्वास और अवसर देने की आवश्यकता थी।
गुर्जर-बकरवाल समुदाय के लिए तिरंगा केवल एक राष्ट्रीय प्रतीक नहीं था। सीमावर्ती जीवन, सुरक्षा बलों के साथ वर्षों पुराने प्रगाढ़ संबंध और राष्ट्र के प्रति उनकी सामाजिक प्रतिबद्धता ने तिरंगे को उनके लिए विशेष अर्थ दिया था। सीमा पर रहने वाले इन परिवारों ने कठिन परिस्थितियों में देश की सुरक्षा व्यवस्था के साथ हमेशा अपना सहयोग बनाए रखा है। उनके लिए राष्ट्र और तिरंगा किसी दूर बैठे सत्ता-केंद्र की अवधारणा नहीं, बल्कि उनके रोजमर्रा के जीवन और उनकी अपनी धरती से जुड़ी वास्तविकता है।
यही वह पृष्ठभूमि थी जिसमें वर्ष 2022 में केंद्र सरकार ने ‘हर घर तिरंगा’ को राष्ट्रीय अभियान के रूप में आगे बढ़ाया। 22 जुलाई 2022 को आदरणीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने देशवासियों से इस अभियान से जुड़ने और अपने घरों पर राष्ट्रीय ध्वज फहराने का आह्वान किया। ‘आजादी का अमृत महोत्सव’ के अंतर्गत इस अभियान का उद्देश्य नागरिकों और राष्ट्रीय ध्वज के बीच व्यक्तिगत जुड़ाव को मजबूत करना था। हम इस राष्ट्रीय अभियान का पूरा सम्मान करते हैं। राष्ट्रध्वज को घर-घर तक पहुंचाना और करोड़ों नागरिकों को उससे जोड़ना निश्चित रूप से एक ऐतिहासिक राष्ट्रीय उपलब्धि है।
लेकिन राष्ट्रीय इतिहास केवल सरकारी घोषणाओं से नहीं बनता; उसके पीछे अनेक ऐसे जमीनी प्रयास भी होते हैं, जिन्हें इतिहास के बड़े पन्नों में जगह नहीं मिल पाती। कश्मीर की यह कहानी उसी जमीनी इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय है। जब यह कहा जाता था कि कश्मीर में तिरंगा उठाने वाला कोई नहीं मिलेगा, तब इंटरनेशनल गुर्जर महासभा ने सीमावर्ती गांवों से स्पष्ट संदेश दिया था कि राष्ट्रभक्त गुर्जर-बकरवाल समाज सीमाओं पर डटा है और तिरंगे की आन-बान-शान के लिए आखिरी सांस तक खड़ा रहेगा।
हमने तिरंगा केवल लोगों के हाथों में नहीं सौंपा, बल्कि उसे उनके दिलों तक पहुंचाने का प्रयास किया। हमने युवाओं को जोड़ा और महिलाओं, बुजुर्गों तथा बच्चों से संवाद किया। हमने बताया कि तिरंगा केवल दिल्ली, जम्मू या श्रीनगर का नहीं है; यह करनाह के घर का भी उतना ही सम्मान है, बंगस की बस्ती का भी उतना ही गौरव है और कुपवाड़ा के दूरदराज गांव का भी उतना ही अधिकार है। राष्ट्रध्वज का वास्तविक सम्मान तभी है, जब वह देश के अंतिम गांव और अंतिम घर तक पहुंचे और वहां रहने वाला नागरिक भी उसे उतने ही गर्व के साथ अपने घर पर फहराए जितना देश की राजधानी में रहने वाला नागरिक।
इस पूरी यात्रा में कर्नल देव आनंद लोहमरोड़ का नेतृत्व उल्लेखनीय रहा। उन्होंने सैनिक जीवन में जिस राष्ट्रभाव को जिया, उसे सामाजिक जीवन में भी आगे बढ़ाया। उनके नेतृत्व में हमने यह अनुभव किया कि यदि समाज के भीतर विश्वास पैदा किया जाए और लोगों को सम्मान के साथ जोड़ा जाए, तो कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी राष्ट्रीय एकता की भावना को मजबूत किया जा सकता है।
आज जब देश के हर घर पर तिरंगा लहराता दिखाई देता है, तो हमें गर्व होता है कि जिस भावना को हमने वर्षों पहले सीमावर्ती गांवों में मजबूत करने का प्रयास किया था, वह आज पूरे देश की चेतना का हिस्सा बन चुकी है। ‘हर घर तिरंगा’ ने इस भावना को राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक स्वरूप दिया, लेकिन हमें उन सीमावर्ती गांवों और उन गुमनाम कार्यकर्ताओं को भी याद रखना चाहिए, जिन्होंने कठिन परिस्थितियों में वर्षों पहले घरों के दरवाजे खटखटाकर कहा था—यह तिरंगा आपका है, यह देश आपका है और इस तिरंगे की आन-बान-शान के लिए हम आपके साथ खड़े हैं।
कश्मीर की सरहदों पर लहराया गया वह तिरंगा आज देश के घर-घर में दिखाई देता है। यही उस यात्रा की सबसे बड़ी सार्थकता है और यही उन सभी सीमावर्ती परिवारों, कार्यकर्ताओं व राष्ट्रभक्त नागरिकों के प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि है, जिन्होंने कठिन समय में भी तिरंगे को झुकने नहीं दिया।
Priyanka Mali state head Rajasthan


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