बलूचिस्तान की आज़ादी की घोषणा: क्या पाकिस्तान के विघटन की आहट या दशकों पुराने संघर्ष का नया अध्याय?
कर्नल देव आनंद लोहमरोर
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13 जुलाई 2026 को कुछ बलोच राष्ट्रवादी कार्यकर्ताओं द्वारा “रिपब्लिक ऑफ बलूचिस्तान” की घोषणा ने एक बार फिर दक्षिण एशिया की राजनीति को चर्चा के केंद्र में ला दिया है। इस घोषणा के साथ राष्ट्रीय ध्वज, राष्ट्रगान, मुद्रा, पासपोर्ट और कथित रूप से 85 प्रतिशत भूभाग पर नियंत्रण जैसे दावे भी किए गए। हालांकि, इन दावों की अभी तक किसी स्वतंत्र अंतरराष्ट्रीय स्रोत, संयुक्त राष्ट्र अथवा किसी संप्रभु राष्ट्र द्वारा पुष्टि नहीं की गई है। इसलिए इन्हें फिलहाल बलोच राष्ट्रवादी समूहों के दावे के रूप में ही देखा जाना चाहिए। इसके बावजूद यह घटनाक्रम इस बात का संकेत अवश्य देता है कि बलूचिस्तान का प्रश्न केवल पाकिस्तान का आंतरिक मामला नहीं रह गया, बल्कि यह संसाधनों, पहचान, मानवाधिकार और अंतरराष्ट्रीय भू-राजनीति से जुड़ा एक जटिल विषय बन चुका है।
लगभग 44 प्रतिशत भूभाग और केवल लगभग 7–8 प्रतिशत आबादी वाला बलूचिस्तान पाकिस्तान का सबसे बड़ा तथा प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध प्रांत है। इसकी सांस्कृतिक और भौगोलिक उपस्थिति केवल पाकिस्तान तक सीमित नहीं, बल्कि अफगानिस्तान के हेलमंद, निमरोज़ तथा कंधार के कुछ भागों और ईरान के सिस्तान-बलूचिस्तान तक फैली हुई है। रेको डिक के विशाल तांबा एवं स्वर्ण भंडार, सूई गैस क्षेत्र, अरब सागर पर स्थित ग्वादर बंदरगाह तथा चीन–पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (CPEC) इसे असाधारण सामरिक महत्व प्रदान करते हैं। विडंबना यह है कि प्राकृतिक संपदा से समृद्ध यह क्षेत्र लंबे समय से विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार जैसे बुनियादी मानकों पर पाकिस्तान के सबसे पिछड़े क्षेत्रों में गिना जाता है। यही असंतोष समय के साथ राजनीतिक और फिर सशस्त्र आंदोलन में बदलता गया।
बलूचिस्तान की वर्तमान स्थिति को समझने के लिए उसके इतिहास को जानना आवश्यक है। यही वह क्षेत्र है जहाँ स्थित मेहरगढ़ को भारतीय उपमहाद्वीप की सबसे प्राचीन नवपाषाण (Neolithic) स्थायी मानव बस्तियों में माना जाता है, जिसने आगे चलकर सिंधु-सरस्वती सभ्यता के विकास की आधारभूमि तैयार की। ब्रिटिश शासन के अंतिम वर्षों में यहाँ कलात एक प्रमुख रियासत थी। 1947 में ब्रिटिश सत्ता समाप्त होने के बाद कलात ने स्वयं को स्वतंत्र घोषित किया और तत्काल पाकिस्तान में विलय स्वीकार नहीं किया। कलात के शासक मीर अहमद यार खान स्वतंत्र दर्जा चाहते थे। किंतु मार्च–अप्रैल 1948 में पाकिस्तान ने सैन्य दबाव बनाया और अंततः कलात का पाकिस्तान में विलय हो गया। बलोच राष्ट्रवादी आज भी इस विलय को स्वैच्छिक नहीं बल्कि दबाव में कराया गया राजनीतिक निर्णय मानते हैं और इसी ऐतिहासिक विवाद को अपने आत्मनिर्णय के दावे का आधार बताते हैं।
1948 के बाद बलूच विद्रोह कई चरणों में सामने आया। 1958, 1962, 1973 और फिर 2003 के बाद आंदोलन ने अलग-अलग रूप धारण किए। प्रत्येक दौर में मुख्य शिकायतें लगभग समान रहीं—प्राकृतिक संसाधनों पर स्थानीय अधिकार, राजनीतिक स्वायत्तता, आर्थिक हिस्सेदारी और सांस्कृतिक पहचान का संरक्षण। समय के साथ इन मांगों का स्वर अधिक उग्र होता गया।
आंदोलन का सबसे बड़ा मोड़ वर्ष 2006 में आया, जब प्रभावशाली बलोच नेता नवाब अकबर बुगटी पाकिस्तान सेना के सैन्य अभियान में मारे गए। पाकिस्तान सरकार ने इसे आतंकवाद विरोधी कार्रवाई बताया, जबकि बलोच संगठनों ने इसे राजनीतिक हत्या कहा। उनकी मृत्यु के बाद बलूच राष्ट्रवाद को नई ऊर्जा मिली और बड़ी संख्या में युवाओं ने अलगाववादी संगठनों का रुख किया। इसी अवधि में पाकिस्तान की सुरक्षा एजेंसियों पर जबरन गुमशुदगी, हिरासत और मानवाधिकार उल्लंघन के आरोप भी लगातार अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठते रहे। मानवाधिकार संगठनों ने इन आरोपों पर चिंता व्यक्त की है, जबकि पाकिस्तान इन आरोपों से लगातार इनकार करता रहा है।
इसी दौरान चीन–पाकिस्तान आर्थिक गलियारा और ग्वादर बंदरगाह पाकिस्तान की आर्थिक रणनीति का केंद्र बन गए। लगभग 60 अरब डॉलर की इस परियोजना का अधिकांश स्थलीय मार्ग बलूचिस्तान से होकर गुजरता है, जिससे इस क्षेत्र का सामरिक महत्व और बढ़ गया है। दूसरी ओर अनेक बलूच संगठनों का आरोप है कि इन परियोजनाओं से स्थानीय जनता को अपेक्षित लाभ नहीं मिला, जबकि उनकी भूमि और संसाधनों का दोहन बढ़ा। इसी कारण कई बार चीनी परियोजनाएँ, इंजीनियर और सुरक्षा प्रतिष्ठान अलगाववादी हमलों का लक्ष्य बने। हाल के वर्षों में बलूच लिबरेशन आर्मी (BLA) ने कई बड़े हमलों की जिम्मेदारी ली है। उल्लेखनीय है कि पाकिस्तान, अमेरिका, ब्रिटेन और कई अन्य देशों ने BLA को आतंकवादी संगठन घोषित किया है।
हाल के दिनों में “रिपब्लिक ऑफ बलूचिस्तान” की घोषणा के साथ यह दावा भी किया गया कि क्षेत्र के अधिकांश भाग पर बलूच बलों का नियंत्रण है। किंतु इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध नहीं है। संयुक्त राष्ट्र के अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुसार केवल स्वतंत्रता की घोषणा कर देना किसी क्षेत्र को स्वतः संप्रभु राष्ट्र नहीं बना देता। किसी नए राष्ट्र की व्यवहारिक वैधता उसके प्रभावी प्रशासन, स्थायी संस्थाओं और अन्य देशों द्वारा मान्यता पर भी निर्भर करती है। आज तक किसी भी देश ने बलूचिस्तान को स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में मान्यता नहीं दी है। इसलिए वर्तमान घोषणा का राजनीतिक और प्रतीकात्मक महत्व तो है, लेकिन इसकी अंतरराष्ट्रीय वैधानिक स्थिति अभी स्थापित नहीं हुई है।
भारत ने आधिकारिक रूप से कभी बलूचिस्तान की स्वतंत्रता का समर्थन नहीं किया है। दूसरी ओर ईरान के चाबहार बंदरगाह में भारत का निवेश इस पूरे क्षेत्र के सामरिक महत्व को और बढ़ा देता है, क्योंकि यही मार्ग पाकिस्तान को दरकिनार करते हुए अफगानिस्तान तथा मध्य एशिया तक भारत की पहुँच का महत्वपूर्ण विकल्प प्रदान करता है। 15 अगस्त 2016 को लाल किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने स्वतंत्रता दिवस संबोधन में बलूचिस्तान, गिलगित-बाल्टिस्तान और पाकिस्तान अधिकृत जम्मू-कश्मीर के लोगों पर होने वाले कथित अत्याचारों का उल्लेख किया था। उस समय इस वक्तव्य को पाकिस्तान की नीतियों पर एक कूटनीतिक संदेश के रूप में देखा गया। इसके बाद भी भारत की आधिकारिक नीति यही रही है कि वह किसी अन्य देश के आंतरिक मामलों में प्रत्यक्ष हस्तक्षेप नहीं करता, किंतु मानवाधिकारों और आतंकवाद जैसे मुद्दों पर अपनी चिंता व्यक्त करता है।
पाकिस्तान के सामने चुनौती केवल बलूचिस्तान तक सीमित नहीं है। खैबर पख्तूनख्वा में भी सुरक्षा स्थिति लगातार चुनौतीपूर्ण बनी हुई है। यदि विभिन्न क्षेत्रों में असंतोष बढ़ता है, तो पाकिस्तान की संघीय व्यवस्था पर दबाव बढ़ सकता है। हालांकि यह कहना कि पाकिस्तान शीघ्र ही टूट जाएगा, वर्तमान परिस्थितियों में एक अनुमान मात्र होगा। किसी भी राष्ट्र का भविष्य केवल आंतरिक असंतोष से नहीं, बल्कि उसकी राजनीतिक संस्थाओं, सैन्य क्षमता, आर्थिक स्थिति और अंतरराष्ट्रीय समर्थन से भी निर्धारित होता है।
बलूचिस्तान का प्रश्न आने वाले वर्षों में दक्षिण एशिया की सबसे महत्वपूर्ण भू-राजनीतिक चुनौतियों में से एक बना रह सकता है। यदि पाकिस्तान संसाधनों के न्यायपूर्ण वितरण, राजनीतिक भागीदारी, मानवाधिकारों के सम्मान और स्थानीय विश्वास बहाली की दिशा में ठोस कदम नहीं उठाता, तो यह असंतोष और गहरा सकता है। दूसरी ओर यदि हिंसा और सशस्त्र संघर्ष बढ़ते हैं, तो इसका प्रभाव केवल पाकिस्तान तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि चीन के निवेश, ऊर्जा सुरक्षा, अरब सागर की सामरिक स्थिति, चाबहार बंदरगाह, मध्य एशिया से संपर्क परियोजनाओं तथा पूरे क्षेत्र के शक्ति-संतुलन पर भी पड़ेगा।
आज बलूचिस्तान केवल एक प्रांत का प्रश्न नहीं है। यह इतिहास, सभ्यता, पहचान, संसाधनों, संघीय राजनीति और मानवाधिकारों के बीच संतुलन की परीक्षा बन चुका है। आने वाला समय बताएगा कि यह संघर्ष पाकिस्तान के भीतर किसी राजनीतिक समाधान की ओर बढ़ता है या दक्षिण एशिया के भू-राजनीतिक मानचित्र में किसी नए अध्याय की भूमिका लिखता है।


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