लोकतंत्र की आड़ में अराजकता: क्या भारत एक नए हाइब्रिड अस्थिरता अभियान का सामना कर रहा है?
कर्नल देव आनंद लोहमरोड़…
रक्षा एवं भू-राजनीतिक मामलों के जानकार …
लोकतंत्र किसी भी राष्ट्र की सबसे बड़ी शक्ति है, लेकिन यही लोकतंत्र तब चुनौती के घेरे में आ जाता है जब शांतिपूर्ण विरोध और सुनियोजित हिंसा के बीच की रेखा धुंधली
होने लगे। संसद मार्च के दौरान जो घटनाएँ सामने आईं, उन्होंने केवल कानून-व्यवस्था का प्रश्न ही नहीं उठाया, बल्कि यह सोचने को भी विवश किया कि क्या भारत के भीतर असंतोष की वास्तविक भावनाओं का उपयोग कुछ ऐसे तत्व कर रहे हैं जिनका उद्देश्य केवल विरोध दर्ज कराना नहीं, बल्कि राष्ट्रीय संस्थाओं पर दबाव बनाकर अस्थिरता उत्पन्न करना है।
मेरे विचार से किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में शांतिपूर्ण प्रदर्शन प्रत्येक नागरिक का अधिकार है, किंतु जब किसी आंदोलन में पुलिस पर पथराव हो, सरकारी संपत्ति को क्षति पहुँचाई जाए, सुरक्षा बलों को घायल किया जाए और संसद जैसी संवैधानिक संस्था की ओर बिना आवश्यक अनुमति के भीड़ बढ़ने लगे, तब वह केवल आंदोलन नहीं रह जाता, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और सार्वजनिक व्यवस्था का विषय बन जाता है। ऐसे समय सरकार, पुलिस और खुफिया एजेंसियों की भूमिका केवल भीड़ को नियंत्रित करने तक सीमित नहीं रह सकती; उन्हें यह भी देखना होगा कि कहीं इस प्रकार की घटनाओं के पीछे कोई सुनियोजित रणनीति तो कार्य नहीं कर रही।
मेरे विचार से यह पहला अवसर नहीं है जब किसी जन-आंदोलन की आड़ में राष्ट्रीय सुरक्षा और सार्वजनिक व्यवस्था को लेकर गंभीर प्रश्न खड़े हुए हों। इससे पूर्व शाहीन बाग आंदोलन, 26 जनवरी 2021 को लाल किले पर हुई हिंसा, भीमा कोरेगांव मामला, और मणिपुर में जातीय असंतोष के दौरान उपद्रवी तत्वों की घुसपैठ जैसी परिस्थितियाँ सामने आ चुकी हैं। चाहे नागरिकता कानून विरोधी प्रदर्शनों के दौरान सामाजिक ध्रुवीकरण की कोशिश हो, लाल किले पर अंतरराष्ट्रीय ‘टूलकिट’ के माध्यम से डिजिटल दुष्प्रचार हो, या विदेशों में भारतीय दूतावासों को निशाना बनाना हो—इन सभी में एक समान पैटर्न दिखाई देता है। यह इस आशंका को बल देता है कि वैध जन-आंदोलनों और स्थानीय असंतोष का लाभ उठाकर कुछ असामाजिक, अलगाववादी अथवा भारत की एकता और स्थिरता को चुनौती देने वाले तत्व अपने उद्देश्य साधने का प्रयास कर रहे हैं। यदि समय-समय पर अलग-अलग आंदोलनों में राष्ट्रीय प्रतीकों, संवैधानिक संस्थाओं, सुरक्षा बलों और सार्वजनिक संपत्ति को निशाना बनाने की प्रवृत्ति दिखाई देती है, तो इन घटनाओं को केवल अलग-थलग कानून-व्यवस्था की समस्या मानकर नहीं छोड़ा जा सकता। आवश्यकता इस बात की है कि इन सभी घटनाओं का राष्ट्रीय सुरक्षा के व्यापक परिप्रेक्ष्य में समग्र विश्लेषण किया जाए तथा यह निष्पक्ष रूप से जाँचा जाए कि कहीं लोकतांत्रिक अधिकारों की आड़ में भारत की आंतरिक स्थिरता को कमजोर करने का कोई सुनियोजित प्रयास तो नहीं हो रहा। यदि ऐसे तत्वों की पहचान होती है, तो उनके विरुद्ध कानून के अनुसार कठोरतम कार्रवाई की जानी चाहिए, क्योंकि लोकतंत्र की रक्षा तभी संभव है जब शांतिपूर्ण विरोध और सुनियोजित अराजकता के बीच स्पष्ट अंतर बनाए रखा जाए।
विश्व के अनेक देशों में तथाकथित “हाइब्रिड वॉरफेयर” का प्रयोग देखा गया है, जहाँ वास्तविक जन-असंतोष के साथ संगठित दुष्प्रचार, डिजिटल अभियान, राजनीतिक ध्रुवीकरण और हिंसक तत्वों की घुसपैठ जोड़कर राज्य को अस्थिर करने का प्रयास किया जाता है। भारत जैसे विशाल लोकतंत्र को भी इस संभावना को गंभीरता से लेना होगा। यदि किसी आंदोलन में असामाजिक या हिंसक तत्व प्रवेश करते हैं, तो उनकी पहचान आंदोलनकारियों से अलग करना और कानून के अनुसार कार्रवाई करना आवश्यक है।
इस पूरे घटनाक्रम ने कुछ गंभीर प्रश्न भी खड़े किए हैं। यदि किसी जुलूस को संसद की ओर जाने की अनुमति नहीं थी, तो वह स्थिति वहाँ तक पहुँची कैसे? यदि भीड़ का आकार लगातार बढ़ रहा था, तो क्या समय रहते पर्याप्त रोकथाम की जा सकती थी? यदि कहीं हिंसा की आशंका थी, तो क्या निवारक उपाय पर्याप्त थे? इन प्रश्नों का उत्तर केवल राजनीतिक बहस से नहीं, बल्कि निष्पक्ष प्रशासनिक समीक्षा से मिलना चाहिए।
राष्ट्रीय राजधानी में किसी भी बड़े प्रदर्शन के दौरान आधुनिक तकनीक का अधिक प्रभावी उपयोग किया जाना चाहिए। ड्रोन निगरानी, वीडियो विश्लेषण, डिजिटल फॉरेंसिक, सीसीटीवी नेटवर्क, भीड़ की वास्तविक समय में निगरानी तथा हिंसक गतिविधियों में शामिल व्यक्तियों की वैज्ञानिक पहचान भविष्य की आवश्यकता है। इससे शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों और हिंसक उपद्रवियों के बीच स्पष्ट अंतर किया जा सकेगा और निर्दोष नागरिक अनावश्यक कार्रवाई से भी बचेंगे।
एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू वित्तीय स्रोतों का है। किसी भी बड़े आंदोलन के दौरान यदि भोजन, परिवहन, मंच, प्रचार सामग्री और अन्य संसाधनों की व्यापक व्यवस्था दिखाई देती है, तो स्वाभाविक रूप से यह प्रश्न उठता है कि उसका वित्तपोषण कहाँ से हुआ। यदि कोई अवैध या विदेशी वित्तीय नेटवर्क सक्रिय पाया जाता है, तो उसकी गहन जाँच होना राष्ट्रीय हित में है। वहीं यदि सब कुछ वैध और पारदर्शी है, तो वह भी स्पष्ट रूप से सामने आना चाहिए। लोकतंत्र में पारदर्शिता दोनों पक्षों के लिए समान रूप से आवश्यक है।
सोशल मीडिया ने आंदोलनों की प्रकृति को पूरी तरह बदल दिया है। कुछ ही घंटों में हजारों लोगों को संगठित करना, भावनात्मक संदेशों का प्रसार करना और भीड़ को एक दिशा देना आज पहले की तुलना में कहीं अधिक आसान हो गया है। इसलिए डिजिटल प्लेटफॉर्मों पर फैलने वाली भ्रामक सूचनाओं, अफवाहों और हिंसा के लिए उकसाने वाली सामग्री की समयबद्ध पहचान और कानूनी कार्रवाई भी राष्ट्रीय सुरक्षा का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी है।
राजनीतिक दलों को भी आत्ममंथन करना होगा। किसी भी लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है, लेकिन यदि किसी आंदोलन में हिंसा, सार्वजनिक संपत्ति की क्षति या पुलिस पर हमला होता है, तो उसका समर्थन या औचित्य सिद्ध करने का प्रयास लोकतांत्रिक संस्कृति को कमजोर करता है। इसी प्रकार सरकार की भी जिम्मेदारी है कि वह वैध असहमति को स्थान दे, परंतु हिंसा के प्रति शून्य सहनशीलता (Zero Tolerance) का संदेश स्पष्ट रूप से दे।
पुलिस व्यवस्था के संदर्भ में भी भविष्य के लिए अनेक सबक सामने आते हैं। भीड़ नियंत्रण केवल लाठीचार्ज या बल प्रयोग का विषय नहीं है, बल्कि पूर्व खुफिया सूचना, निवारक कार्रवाई, संवेदनशील क्षेत्रों की सुरक्षा, भीड़ के नेतृत्व की पहचान, संभावित हिंसक तत्वों पर निगरानी तथा स्थानीय प्रशासन के बेहतर समन्वय का विषय भी है। यदि इन सभी पहलुओं पर समय रहते प्रभावी कार्य किया जाए, तो अनेक घटनाओं को प्रारंभिक स्तर पर ही रोका जा सकता है।
भारत आज केवल पारंपरिक सुरक्षा चुनौतियों का सामना नहीं कर रहा है। सूचना युद्ध, मनोवैज्ञानिक अभियान, डिजिटल दुष्प्रचार, सामाजिक ध्रुवीकरण और भीड़ आधारित अस्थिरता जैसी चुनौतियाँ भी समान रूप से गंभीर होती जा रही हैं। इसलिए राष्ट्रीय सुरक्षा की अवधारणा को भी उसी अनुरूप व्यापक बनाना होगा। हमें यह स्वीकार करना होगा कि लोकतंत्र की रक्षा केवल सीमाओं पर तैनात सैनिक ही नहीं करते, बल्कि मजबूत संस्थाएँ, निष्पक्ष कानून-व्यवस्था, जागरूक नागरिक और उत्तरदायी राजनीति भी करती है।
संसद केवल एक भवन नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की सर्वोच्च संवैधानिक संस्था है। उसके आसपास होने वाली प्रत्येक घटना का राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय संदेश जाता है। इसलिए भविष्य में किसी भी प्रदर्शन को इस प्रकार संचालित किया जाना चाहिए कि लोकतांत्रिक अधिकार भी सुरक्षित रहें और राष्ट्रीय संस्थाओं की गरिमा भी अक्षुण्ण बनी रहे।
अंततः मेरा मानना है कि भारत को न तो वैध जन-आवाज़ों से भयभीत होने की आवश्यकता है और न ही हिंसक तत्वों के सामने झुकने की। आवश्यकता इस बात की है कि शांतिपूर्ण नागरिकों और सुनियोजित उपद्रवियों के बीच स्पष्ट अंतर किया जाए, प्रत्येक हिंसक घटना की निष्पक्ष जाँच हो, वित्तीय एवं डिजिटल नेटवर्क की पारदर्शी पड़ताल हो तथा दोषी चाहे किसी भी विचारधारा, संगठन या प्रभावशाली समूह से जुड़े हों, उनके विरुद्ध कानून के अनुसार कठोर कार्रवाई की जाए। यही लोकतंत्र की रक्षा का मार्ग है, यही राष्ट्रीय सुरक्षा की पहली शर्त है और यही विकसित भारत की दिशा में आगे बढ़ने का सबसे सशक्त आधार भी।
प्रियंका माली स्टेट हेड राजस्थान

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