स्टेट ब्यूरो प्रियंका माली की रिपोर्ट
लेखक: कर्नल देव आनंद लोहामरोड़
सुरक्षा एवं अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञ….
देशभक्ति केवल युद्धभूमि तक सीमित नहीं होती। संकट के समय आर्थिक अनुशासन और जिम्मेदार नागरिकता भी राष्ट्रसेवा का रूप बन जाती है। वर्ष 2020 के कोविड संकट के दौरान भारतीयों के सामूहिक अनुशासन ने देश की प्राण रक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। आज 2026 की वैश्विक ऊर्जा और आर्थिक अस्थिरता के बीच वही भावना भारत की आर्थिक सुरक्षा के लिए आवश्यक है। ईरान-इज़राइल-अमेरिका संघर्ष ने वैश्विक ऊर्जा बाजारों को अस्थिर कर दिया है, समुद्री व्यापार मार्गों पर खतरा बढ़ा दिया है और तेल आपूर्ति को लेकर पूरी दुनिया में अनिश्चितता पैदा कर दी है।
इस संकट का प्रभाव पूरी दुनिया में दिखाई दे रहा है। अमेरिका में पेट्रोल लगभग ₹115 प्रति लीटर, ब्रिटेन में ₹195, फ्रांस में ₹200, जर्मनी में ₹205, इटली में ₹210 और सिंगापुर में लगभग ₹240 प्रति लीटर पहुँच चुका है। जापान में यह लगभग ₹160, इज़राइल में ₹185 और दक्षिण कोरिया में लगभग ₹150 प्रति लीटर है। कई देशों में ईंधन की कीमतों में 25% से 35% तक वृद्धि हो चुकी है। दूसरी ओर सोने की कीमतों में भी भारी उछाल आया है। भारत, जो दुनिया का पाँचवाँ सबसे बड़ा स्वर्ण खरीदार है, ने वर्ष 2024 में लगभग 6.8 लाख करोड़ रुपये का सोना आयात किया। औसतन भारत प्रतिदिन लगभग ₹1800 करोड़ और हर घंटे लगभग ₹78 करोड़ का सोना विदेशों से खरीदता है। भारत अपनी आवश्यकता का लगभग 90% कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है और वर्ष 2024 में लगभग 12 लाख करोड़ रुपये केवल कच्चे तेल के आयात पर खर्च किए गए। इसके अतिरिक्त भारत हर वर्ष लगभग डेढ़ लाख करोड़ रुपये के रासायनिक उर्वरक और लगभग 60% खाद्य तेल भी विदेशों से आयात करता है। तेल कीमतों में और वृद्धि या डॉलर पर दबाव का सीधा असर भारत की अर्थव्यवस्था, रुपये की मजबूती और आम नागरिकों पर पड़ता है।
इन परिस्थितियों के बावजूद भारत सरकार ने अब तक इस अतिरिक्त बोझ को सीधे आम जनता तक नहीं पहुँचने दिया है। ईरान संकट के बाद सरकार ने पेट्रोल पर लगभग ₹24 प्रति लीटर और डीज़ल पर लगभग ₹30 प्रति लीटर तक का अतिरिक्त भार टैक्स कटौती और आर्थिक प्रबंधन के माध्यम से स्वयं वहन किया। डीज़ल पर एक्साइज ड्यूटी लगभग ₹10 प्रति लीटर से घटाकर लगभग शून्य तक लाई गई तथा पेट्रोल पर भी भारी टैक्स कटौती की गई। यदि सरकार हस्तक्षेप नहीं करती तो मार्च और अप्रैल के बीच तेल कंपनियों पर लगभग ₹62 हजार करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ पड़ सकता था। सरकारी राहत के बाद भी तेल कंपनियों को लगभग ₹30 हजार करोड़ रुपये का नुकसान और प्रतिदिन लगभग ₹1000 करोड़ रुपये का आर्थिक दबाव सहना पड़ा, ताकि महंगाई का सीधा असर आम नागरिकों पर न पड़े। यही कारण है कि 28 फरवरी को ईरान संघर्ष शुरू होने के बाद भी भारत में पेट्रोल-डीज़ल की कीमतें काफी हद तक स्थिर बनी हुई हैं और पेट्रोल लगभग ₹95 प्रति लीटर के आसपास उपलब्ध है।
भारत ने इससे पहले भी ऐसे आर्थिक दौर देखे हैं। वर्ष 1968 में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी सरकार ने विदेशी मुद्रा भंडार बचाने और सोने के आयात को नियंत्रित करने के लिए “गोल्ड कंट्रोल एक्ट” लागू किया था। इसके बाद 1973 के वैश्विक तेल संकट के दौरान भी ऊर्जा संरक्षण और पेट्रोलियम खपत कम करने पर जोर दिया गया। बाद में 1991 के गंभीर आर्थिक संकट और खाड़ी युद्ध के प्रभाव के समय प्रधानमंत्री पी. वी. नरसिम्हा राव तथा वित्त मंत्री मनमोहन सिंह ने आर्थिक अनुशासन, तेल आयात कम करने और विदेशी मुद्रा बचाने की आवश्यकता पर बल दिया था। उस समय भारत को अर्थव्यवस्था स्थिर करने के लिए लगभग 67 टन सोना गिरवी रखना पड़ा था।
वर्तमान संकट के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशवासियों से सात महत्वपूर्ण अपीलें की हैं। उन्होंने पेट्रोल-डीज़ल की खपत कम करने, मेट्रो और कार पूलिंग अपनाने, अनावश्यक यात्रा से बचने, गैर-जरूरी सोना खरीद कम करने, “वोकल फॉर लोकल” को अपनाने, रासायनिक उर्वरकों का सीमित उपयोग करने, खाद्य तेल की खपत नियंत्रित करने तथा “वर्क फ्रॉम होम” और ऑनलाइन मीटिंग्स को बढ़ावा देने की बात कही। इसके साथ ही विदेश यात्राओं और डेस्टिनेशन वेडिंग्स को सीमित करने का भी आग्रह किया गया। वर्ष 2023 में भारतीयों ने विदेशों में लगभग 27.2 लाख करोड़ रुपये खर्च किए, जबकि लगभग 3.5 करोड़ भारतीय विदेश यात्रा पर गए। यदि इस खर्च का एक बड़ा हिस्सा भारत के पर्यटन, होटल उद्योग और स्थानीय अर्थव्यवस्था में लगाया जाए, तो इससे रोजगार और घरेलू व्यापार को बड़ा लाभ मिल सकता है।
इन सभी अपीलों का मुख्य उद्देश्य स्पष्ट है — ऊर्जा बचाना और विदेशी मुद्रा भंडार को सुरक्षित रखना। अधिक आयात का अर्थ अधिक डॉलर का देश से बाहर जाना है, जिससे रुपया कमजोर होता है और महंगाई का दबाव बढ़ता है। यदि तेल, सोना, खाद्य तेल और विदेशी वस्तुओं पर निर्भरता कम की जाए, तो आयात बिल घटेगा, विदेशी मुद्रा भंडार मजबूत होगा, व्यापार घाटा कम होगा और अर्थव्यवस्था अधिक स्थिर बनेगी। वर्तमान में भारत के पास लगभग 703 बिलियन डॉलर यानी लगभग ₹66 लाख करोड़ का विदेशी मुद्रा भंडार है। इसके साथ देश के पास लगभग 60 दिनों का कच्चे तेल का भंडार, लगभग 60 दिनों का प्राकृतिक गैस भंडार और लगभग 45 दिनों का एलपीजी स्टॉक उपलब्ध है। यह वर्षों की रणनीतिक तैयारी और आर्थिक योजना का परिणाम है।
इसके साथ ही कुछ वर्ग हर राष्ट्रीय संकट को राजनीतिक नैरेटिव में बदलने का प्रयास करते हैं। कोविड काल में भी वैक्सीन अभियान और राष्ट्रीय एकता के प्रतीकों का मज़ाक उड़ाया गया था। इसके बावजूद भारत ने न केवल संकट का सफलतापूर्वक सामना किया बल्कि कई देशों को वैक्सीन उपलब्ध कराकर मानवता की सहायता भी की। इसी प्रकार ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भी कुछ लोगों ने सेना की उपलब्धियों पर प्रश्न उठाए और प्रमाण माँगे। ऐसे नैरेटिव यह प्रश्न खड़ा करते हैं कि क्या वे अनजाने में उन अंतरराष्ट्रीय “डीप स्टेट” शक्तियों को लाभ पहुँचा रहे हैं जो भारत की सामरिक और आर्थिक स्थिरता को कमजोर करना चाहती हैं।
लोकतंत्र में आलोचना का अधिकार महत्वपूर्ण है, लेकिन राष्ट्रीय संकट के समय राष्ट्रहित राजनीतिक मतभेदों से ऊपर होना चाहिए। भारत हमेशा शांति, संतुलन और वैश्विक स्थिरता का समर्थक रहा है, लेकिन वह यह भी समझता है कि राष्ट्रीय सुरक्षा केवल सैनिकों या सरकार की जिम्मेदारी नहीं है। सैनिक सीमाओं की रक्षा करते हैं, सरकार नीतियाँ बनाती है, लेकिन किसी भी राष्ट्र की वास्तविक शक्ति उसके नागरिक होते हैं।
आज प्रत्येक भारतीय को ऊर्जा संरक्षण को राष्ट्रसेवा, आर्थिक अनुशासन को देशभक्ति और “मेड इन भारत” को राष्ट्रीय गौरव का विषय मानना होगा। कोविड काल में 140 करोड़ भारतीयों ने दिखाया था कि एकता और अनुशासन से सबसे बड़ी चुनौतियों को भी पार किया जा सकता है। आज फिर उसी भावना की आवश्यकता है। यह वैश्विक संकट अवश्य है, लेकिन यदि भारत और उसके नागरिक एकजुट रहें, तो हर संकट को अवसर में बदला जा सकता है।



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