स्टेट हेड प्रियंका माली की रिपोर्ट
लेखक: कर्नल देव आनंद लोहमरोर, सुरक्षा एवं अंतर्राष्ट्रीय मामलों के जानकार…


ग्रेट निकोबार परियोजना भारत की सबसे महत्वाकांक्षी और सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण अवसंरचनात्मक पहलों में से एक है। यह केवल एक विकास परियोजना नहीं, बल्कि भारत की व्यापक भू-राजनीतिक, समुद्री, आर्थिक और राष्ट्रीय सुरक्षा दृष्टि का प्रतीक है। ऐसे समय में जब वैश्विक शक्ति संतुलन तेजी से समुद्री व्यापार मार्गों और सामरिक समुद्री गलियारों के इर्द-गिर्द केंद्रित हो रहा है, तब भारत का ध्यान अपने द्वीपीय क्षेत्रों की ओर बढ़ना अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के दक्षिणी छोर पर स्थित Great Nicobar Island विश्व के सबसे व्यस्त समुद्री मार्गों में से एक Malacca Strait के निकट स्थित है, जहाँ से वैश्विक व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति का बड़ा हिस्सा होकर गुजरता है।
इस परियोजना का मुख्य उद्देश्य ग्रेट निकोबार को एक सामरिक समुद्री और आर्थिक केंद्र के रूप में विकसित करना है, जिससे भारत की इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में स्थिति और प्रभाव मजबूत हो सके। यह पहल राष्ट्रीय सुरक्षा, सामरिक स्वायत्तता, व्यापार विस्तार और समुद्री क्षमता निर्माण से सीधे जुड़ी हुई है। परियोजना का एक प्रमुख लक्ष्य भारत की विदेशी ट्रांसशिपमेंट बंदरगाहों पर निर्भरता को कम करना है। वर्तमान में भारत के बड़े हिस्से का समुद्री कार्गो Colombo Port, Port of Singapore और Port Klang जैसे विदेशी बंदरगाहों के माध्यम से संचालित होता है। इससे न केवल आर्थिक नुकसान होता है, बल्कि भू-राजनीतिक तनाव की स्थिति में सामरिक जोखिम भी उत्पन्न होते हैं। ग्रेट निकोबार में विश्वस्तरीय ट्रांसशिपमेंट हब विकसित करके भारत अपनी आपूर्ति श्रृंखला पर नियंत्रण मजबूत करना चाहता है।
परियोजना के केंद्र में 14.2 मिलियन टीईयू क्षमता वाला अंतरराष्ट्रीय कंटेनर ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल प्रस्तावित है। पूर्व-पश्चिम अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार मार्ग के निकट स्थित होने के कारण ग्रेट निकोबार भविष्य में एक बड़े लॉजिस्टिक्स और समुद्री व्यापार केंद्र के रूप में उभर सकता है। यह परियोजना शिपिंग दक्षता बढ़ाने, लॉजिस्टिक्स लागत कम करने और भारत की वैश्विक व्यापार नेटवर्क में भागीदारी को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
इसके साथ ही परियोजना में लगभग 4000 पीक आवर यात्रियों की क्षमता वाला ग्रीनफील्ड अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा भी शामिल है। यद्यपि इसका उद्देश्य नागरिक संपर्क और आर्थिक विकास को बढ़ाना है, लेकिन इसका सामरिक महत्व भी अत्यंत बड़ा है। द्वीपीय क्षेत्रों में विकसित अवसंरचना अक्सर नागरिक और सैन्य दोनों उद्देश्यों की पूर्ति करती है। बेहतर हवाई संपर्क से लॉजिस्टिक्स, आपदा प्रबंधन, निगरानी क्षमता और हिंद महासागर क्षेत्र में त्वरित सैन्य तैनाती की क्षमता मजबूत होगी। बढ़ती समुद्री प्रतिस्पर्धा के बीच यह अवसंरचना भारत की सामरिक पहुंच को महत्वपूर्ण रूप से बढ़ाएगी।
परियोजना का एक अन्य महत्वपूर्ण भाग 450 एमवीए क्षमता वाला गैस-सोलर हाइब्रिड पावर प्लांट है। वर्तमान में अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में बिजली उत्पादन का प्रमुख स्रोत डीजल जनरेटर हैं, जो महंगे और पर्यावरणीय दृष्टि से चुनौतीपूर्ण हैं। विश्वसनीय और निर्बाध बिजली आपूर्ति बंदरगाहों, हवाई अड्डों, संचार नेटवर्क, निगरानी प्रणालियों और भविष्य के शहरी विकास के लिए अत्यंत आवश्यक है। गैस और सौर ऊर्जा आधारित प्रणाली एक अधिक टिकाऊ और मजबूत ऊर्जा संरचना विकसित करने का प्रयास है।
इन सभी अवसंरचनात्मक योजनाओं के साथ एक आधुनिक नियोजित टाउनशिप का भी प्रस्ताव है, जो प्रशासनिक ढांचे, लॉजिस्टिक्स सेवाओं, आर्थिक गतिविधियों और भविष्य की जनसंख्या आवश्यकताओं को समर्थन प्रदान करेगी। बंदरगाह, हवाई अड्डा, ऊर्जा प्रणाली और शहरी विकास को मिलाकर ग्रेट निकोबार को एक एकीकृत समुद्री और आर्थिक केंद्र के रूप में विकसित करने की योजना बनाई गई है।
कई दशकों तक भारत के द्वीपीय क्षेत्र अपनी सामरिक महत्ता के बावजूद अपेक्षाकृत उपेक्षित रहे। भारत की सुरक्षा नीति मुख्यतः उत्तरी और पश्चिमी सीमाओं पर केंद्रित रही। किंतु इंडो-पैसिफिक क्षेत्र के वैश्विक रणनीतिक प्रतिस्पर्धा के केंद्र बनने और हिंद महासागर क्षेत्र में चीन की बढ़ती गतिविधियों ने समुद्री सुरक्षा के महत्व को नई दिशा दी है। आज समुद्री मार्ग, बंदरगाह, लॉजिस्टिक्स नेटवर्क और समुद्री निगरानी वैश्विक प्रभाव के प्रमुख साधन बन चुके हैं। ऐसे में ग्रेट निकोबार भारत के लिए एक अग्रिम सामरिक चौकी के रूप में उभर रहा है।
इस परियोजना का सामरिक महत्व इसलिए भी अधिक है क्योंकि अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में Andaman and Nicobar Command स्थित है, जो भारत की एकमात्र एकीकृत त्रि-सेवा सैन्य कमान है। ग्रेट निकोबार में आधुनिक अवसंरचना का विकास लॉजिस्टिक्स क्षमता, समुद्री निगरानी, परिचालन दक्षता और सामरिक स्थायित्व को मजबूत करेगा। भविष्य में इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में किसी भी भू-राजनीतिक संकट की स्थिति में समुद्री संचार मार्गों की निगरानी और सुरक्षा अत्यंत निर्णायक होगी। मलक्का जलडमरूमध्य के निकट स्थित होने के कारण ग्रेट निकोबार भारत को महत्वपूर्ण सामरिक बढ़त प्रदान करता है।
हालांकि इस परियोजना को लेकर पर्यावरणीय चिंताएँ भी सामने आई हैं क्योंकि ग्रेट निकोबार घने उष्णकटिबंधीय जंगलों, मैंग्रोव, जैव विविधता और संवेदनशील तटीय पारिस्थितिकी तंत्र से समृद्ध क्षेत्र है। इन चिंताओं को ध्यान में रखते हुए परियोजना को EIA Notification 2006 और ICRZ Notification 2019 के तहत नियामकीय ढांचे में विकसित किया जा रहा है। परियोजना में वन्यजीव संरक्षण, आपदा प्रबंधन, तटीय सुरक्षा और प्रतिपूरक वनीकरण से जुड़े कई अनुपालन प्रावधान शामिल किए गए हैं।
इसके अतिरिक्त ग्रेट निकोबार में रहने वाले Shompen और Nicobarese जैसे आदिवासी समुदायों के हितों को भी परियोजना में विशेष महत्व दिया गया है। परियोजना ढांचे के अनुसार किसी भी जनजातीय समुदाय के विस्थापन का प्रस्ताव नहीं है तथा पुनः अधिसूचना के माध्यम से जनजातीय आरक्षित क्षेत्र में शुद्ध वृद्धि की बात कही गई है। यदि इसे प्रभावी ढंग से लागू किया जाता है, तो यह विकास और जनजातीय संरक्षण के संतुलन का एक महत्वपूर्ण उदाहरण बन सकता है।
आर्थिक दृष्टि से यह परियोजना रोजगार सृजन, समुद्री उद्योगों, लॉजिस्टिक्स सेवाओं, पर्यटन और क्षेत्रीय व्यापार को बढ़ावा दे सकती है। दक्षिण-पूर्व एशिया के साथ बेहतर संपर्क भारत की एक्ट ईस्ट नीति को भी मजबूती प्रदान करेगा।
अंततः ग्रेट निकोबार परियोजना केवल एक अवसंरचना योजना नहीं, बल्कि 21वीं सदी की समुद्री भू-राजनीतिक वास्तविकताओं के अनुरूप भारत की सामरिक सोच में परिवर्तन का प्रतीक है। ऐसे समय में जब वैश्विक प्रभाव समुद्री पहुंच, सुरक्षित व्यापार मार्गों, लॉजिस्टिक्स नियंत्रण और अवसंरचनात्मक क्षमता पर निर्भर होता जा रहा है, तब ग्रेट निकोबार भारत को इंडो-पैसिफिक व्यवस्था में अपनी नई भूमिका स्थापित करने का अवसर प्रदान करता है। यदि इसे दूरदर्शिता, पर्यावरणीय संतुलन और मजबूत संस्थागत प्रतिबद्धता के साथ लागू किया जाता है, तो यह आने वाले दशकों में भारत की समुद्री शक्ति का एक प्रमुख स्तंभ बन सकता है।

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