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February 17, 2026

सच दिखाने की हिम्मत

भौतिकवादी युग में व्यवहारिक शिक्षा के साथ धार्मिक शिक्षा और पाठशाला संस्कार देने वाली दूसरी मां होती है– *डॉ बेला सुराणा*

किरण रांका रिपोर्टर


*आष्टा /महावीर स्वामी जैन पाठशाला गंज मंदिर के उपाश्रय में नगर की बहू- बेटियों को धर्म अध्ययन कराते हुए मोहन बेन सुराणा एवं डॉक्टर बेला सुराणा

आज के इस भौतिकवादी युग में व्यक्ति के जीवन में जितनी आवश्यकता व्यावहारिक शिक्षा की है ,उससे कई गुना अधिक आवश्यकता जीवन में धार्मिक एवं भारतीय संस्कारों का बीजारोपण करने वाली पाठशाला की है ।धार्मिक संस्कार के बगैर जीवन में विकृति की संभावना रहती है। जितनी तत्परता से माता-पिता बच्चों को स्कूल भेजते हैं, उससे भी ज्यादा जरूरी पाठशाला में भेजना समझें। पाठशाला संस्कार देने वाली दूसरी मां है।आज अपने धर्म के मूल संस्कारों के बिना अधिकांश बच्चे धर्म से विमुख हो रहे हैं। सम्यकज्ञान की ज्योति विकसित करने में पाठशाला की अहम भूमिका है। माता-पिता के प्रति श्रद्धा ,कुल का गौरव, धर्म के प्रति लगाव एवं प्राणी मात्र के प्रति संवेदना जगाने का पवित्र मंदिर है पाठशाला।
उक्त बातें श्री महावीर स्वामी श्वेतांबर जैन मंदिर गंज के उपाश्रय में संचालित महावीर स्वामी जैन पाठशाला में बहू -बेटियों एवं बच्चों को धर्म अध्ययन कराते हुए समाज की वरिष्ठ मोहन बेन सुराणा एवं डॉ बेला सुराणा ने कहीं।
इसी अहो भाव के साथ महावीर स्वामी जैन पाठशाला नजर गंज मंदिर के उपाश्रय में संचालित की जा रही है। डॉक्टर बेला सुराणा ने बताया कि समकित ग्रुप से जुड़ जाने के कारण पाठशाला में अधिक संख्या में महिलाएं एवं बच्चे शिक्षण प्राप्त कर रहे हैं ।पाठशाला रात्रि 8 बजे से संचालित की जा रही है, जिसमें समाज की श्राविका बहने ज्ञानदान के पवित्र कार्य में संलग्न है। अतःसमाज जन अधिक से अधिक इस पाठशाला से जुड़े एवं अपने जीवन को सुखमय एवं सफल बनाए
। डॉक्टर बेला सुराना ने बताया कि उनके स्वयं के अलावा समाज की वरिष्ठ मोहन बेन सुराणा, प्रेमा बेन धाड़ीवाल, डॉक्टर चंदा जैन, पदमा बेन कोठारी, रेखा बेन बोहरा अपनी सेवाएं इस पाठशाला में देकर बहू बेटियों एवं बच्चों को धर्म आराधना कराकर धर्म वह संस्कारों का ज्ञान बड़ा रही हैं। श्रीमती सुराणा ने कहा कि हमारी बहनें छोटे बच्चों से लेकर बड़ों तक को पाठशाला के माध्यम से संस्कार दे रही हैं। पाठशाला संस्कार देने वाले बच्चों की दूसरी मां है। हमें इनके काम की सराहना करते हुए इनको प्रोत्साहित करना चाहिए। आपने कहा कि यहां की बेटियों के साथ ही महिलाएं भी पठन पाठन में आगे हैं। पाठशाला बहुत अच्छी तरह से चल रही है। इनको समय-समय पर प्रोत्साहन तो मिलते रहना चाहिए। उन्होंने कहा कि पाठशाला संस्कारों की जननी है ,जिन घरों से अभी पाठशाला में बच्चे नहीं आते वे भी अपने बच्चों को पाठशाला भेजें तो आपके बच्चे यहां आकर धर्म की बातें सीख सकेंगे।