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Dharmendra Singh

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February 15, 2026

सच दिखाने की हिम्मत

कर्नल देव आनंद लोहामरोड़….
हाल के वर्षों में कई ऐसे मामले सामने आए हैं, जहाँ विभिन्न राज्यों की पुलिस द्वारा सैनिकों, भूतपूर्व सैनिकों और उनके परिवारों के साथ दुर्व्यवहार, मारपीट और अनुचित कानूनी कार्रवाई की गई है। यह स्थिति न केवल सैनिक समुदाय के मनोबल को प्रभावित करती है, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा के नजरिए से भी चिंताजनक है। सवाल यह उठता है कि क्या यह सिर्फ आपसी टकराव का नतीजा है? या इसके पीछे कोई संगठित साजिश भी काम कर रही है?

सैनिकों के प्रति बढ़ती हिंसा- पिछले एक वर्ष के दौरान पुलिस द्वारा किए गए कथित हमले :-
. अगस्त 2024 – जयपुर, राजस्थान: एक सेवारत सेना जवान के साथ कपड़े उतरवा कर मारपीट।
. 23 अगस्त 2024- ग्वालियर में मेजर रैंक के सैन्य अधिकारी के साथ पुलिस द्वारा मारपीट ।
. सितंबर 2024 – भुवनेश्वर, ओडिशा, सेना अधिकारी और उनकी मंगेतर के साथ मारपीट और उत्पीड़न ।
. नवंबर 2024 – रायबरेली, उत्तर प्रदेश, सेवानिवृत्त सैनिक इंदल सिंह के साथ मारपीट और फर्जी मुकदमा दर्ज ।
. 13-14 मार्च 2025- रात, पटियाला मे कर्नल पुष्पिंदर सिंह और उनके बेटे की मारपीट ।
. 14 मार्च 2025 – जमशेदपुर, झारखंड: जुगसलाई थाने में सैनिक सूरज राय के साथ पुलिसकर्मियों द्वारा मारपीट और दुर्व्यवहार ।

सैनिकों एवं उनके परिवारों पर पुलिसिया अत्याचार के प्रमुख कारण:-

विदेशी ताकतों की भूमिका:- दुश्मन देश एवं विदेशी संस्थाएँ कुछ समूहों को आर्थिक मदद दे सकती हैं ताकि वे सैनिकों और उनके परिवारों के खिलाफ माहौल बनाएँ तथा उनका मनोबल गिराये जिस से की सेना का मनोबल कमजोर पड़े।

दुश्मन देशों द्वारा मनोवैज्ञानिक युद्ध :- सैनिकों और भूतपूर्व सैनिकों के मनोबल को तोड़ना दुश्मन के मनोवैज्ञानिक युद्ध का हिस्सा हो सकता है जिसको सफल करने के लिए दुश्मन देश नकारात्मक प्रचार के माध्यम से ” सैनिक की सेवाओं का कोई मूल्य नहीं” जैसी भावना पैदा करते है। कई बार नक्सली और अलगाववादी गुटों द्वारा पुलिस और सैनिकों के बीच अविश्वास फैलाने की कोशिश की जाती है।

उचित कानून की कमी :- – सैनिकों और उनके परिवारों के साथ पुलिस द्वारा मारपीट एवं दुर्व्यवहार किए जाने पर दोषी पुलिसकर्मी के खिलाफ कानून की कमी एवं निष्पक्ष जांच समिति में सैन्य अधिकारी सदस्य के अभाव में ऐसे अपराध बार-बार होते रहते हैं । अपराध करने वाले पुलिसकर्मी की निष्पक्ष जांच हेतु सैन्य अधिकारी का जांच समिति में अनिवार्य होना चाहिए।

कानूनी सुधार और आवश्यक संशोधन:–
. विशेष सैन्य सुरक्षा अधिनियम (Special Military Protection Act) का निर्माण:- एक नया कानून बनाया जाए जिसमें सैनिकों और उनके परिवारों के खिलाफ पुलिस द्वारा की गई अनुचित कार्रवाई के मामलों की विशेष जाँच का प्रावधान हो एवं जांच समिति में सैन्य अधिकारी का होना अनिवार्य हो।

. फास्ट ट्रैक कोर्ट/ विशेष शिकायत प्रकोष्ठ (Military Grievance Cell) की स्थापना:- केंद्र सरकार विशेष कानून बनाए जिसके अंतर्गत केंद्र और राज्य स्तर पर एक विशेष प्रकोष्ठ बने, इसमें सैन्य अधिकारियों की भागीदारी हो। यह एजेंसी यह भी जाँच करे कि कहीं इन घटनाओं के पीछे कोई बाहरी साजिश तो नहीं है।

. आंतरिक सुरक्षा और खुफिया एजेंसियों को अधिक सक्रिय बनाना:- IB (इंटेलिजेंस ब्यूरो) और RAW (रिसर्च एंड एनालिसिस विंग) जैसी एजेंसियों को ऐसी घटनाओं की जाँच करने और संभावित विदेशी हस्तक्षेप को रोकने के लिए अधिक सक्रिय बनाया जाए। किसी भी विदेशी धन या प्रभाव के तहत काम करने वाले स्थानीय समूहों पर नज़र रखी जाए।

. भारतीय दंड संहिता (IPC) में संशोधन:- पुलिस द्वारा किए गए मारपीट के वीडियो एवं इलेक्ट्रॉनिक सबूत के बावजूद भी जांच के दौरान सस्पेंड नहीं किया जाना अंग्रेजी कानून की झलक दिखाता है । IPC की धारा 166A के तहत सैनिकों के खिलाफ पुलिसिया उत्पीड़न को विशेष अपराध की श्रेणी में डाला जाए एवं दोषी पुलिस कर्मी को देशद्रोह के तहत दंडित किया जाए।

. राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) की भूमिका बढ़ाई जाए:- सैनिकों और उनके परिवारों पर होने वाले अत्याचारों के मामलों को NHRC में सीधे दर्ज कराने की सुविधा दी जाए। NHRC को विशेष शक्तियाँ दी जाएँ कि वह दोषी पुलिसकर्मियों पर तुरंत उचित कार्रवाई कर सके।

. लोकपाल और राज्य पुलिस शिकायत आयोग :- लोकपाल और राज्य पुलिस शिकायत आयोग को सैनिकों और उनके परिवारों की शिकायतों की जाँच का विशेष अधिकार दिया जाए। इनमें सैनिक संगठनों के प्रतिनिधियों को भी शामिल किया जाए।.

. पुलिस और सेना के बीच समन्वय समिति गठन:-
हर स्तर पर पुलिस और सेना के बीच एक संवाद समिति बनाई जाए, जो समय-समय पर आपसी समझ को बढ़ाने के लिए बैठकें करे। यह समिति सुनिश्चित करे कि पुलिस और सेना के बीच किसी भी प्रकार का टकराव न हो।

निष्कर्ष
सैनिक और भूतपूर्व सैनिक राष्ट्र की रीढ़ होते हैं उनके और उनके परिवारों के साथ पुलिस द्वारा दुर्व्यवहार न केवल अमानवीय है, बल्कि यह पूरे देश के लिए शर्मनाक भी है। सरकार को इस दिशा में ठोस कदम उठाने होंगे, ताकि भविष्य में इस प्रकार की घटनाएँ न हों। कानून में आवश्यक बदलाव, पुलिस प्रशासन में सुधार और सैनिकों के लिए विशेष सुरक्षा उपाय किए जाने चाहिए। इन कदमों के माध्यम से हम सुनिश्चित कर सकते हैं कि सैनिकों, भूतपूर्व सैनिकों और उनके परिवारों के साथ न्याय हो और वे समाज में सम्मानपूर्वक जीवन व्यतीत कर सकें।