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Dharmendra Singh

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May 9, 2026

सच दिखाने की हिम्मत

कटनी: ‘साख’ बचाने की आड़ में वर्चस्व की जंग, हाशिए पर खड़े ‘वरिष्ठों’ ने खोला सक्रिय पत्रकारों के खिलाफ मोर्चा
कटनी। शहर के पत्रकारिता जगत में छिड़ा ‘असली बनाम नकली’ का विवाद अब एक नया मोड़ लेता दिख रहा है। जहाँ एक ओर शुचिता और मूल्यों की दुहाई दी जा रही है, वहीं दूसरी ओर इस पूरी मुहिम की मंशा पर ही गंभीर सवाल खड़े होने लगे हैं। ताज़ा चर्चाओं ने इस बहस को जन्म दे दिया है कि क्या यह सचमुच पत्रकारिता को बचाने की कोशिश है या फिर अपनी खोई हुई जमीन वापस पाने का एक हताश प्रयास?

खबरों से नदारद, पर ‘सर्टिफिकेट’ बांटने में आगे
शहर के गलियारों में यह चर्चा आम है कि जो चेहरे सालों से मुख्यधारा की पत्रकारिता और खबरों से गायब हैं, वे आज खुद को ‘असली’ बताकर दूसरों को प्रमाण पत्र बांट रहे हैं। हैरानी की बात यह है कि जिन पत्रकारों की खबरें प्रतिदिन धरातल पर दिखती हैं और जो जनहित के मुद्दों को उठा रहे हैं, उन्हें ही ‘कथित’ बताकर निशाना बनाया जा रहा है। सवाल उठ रहा है कि क्या केवल ‘वरिष्ठता’ का ठप्पा लग जाने से कोई सक्रिय पत्रकारिता के दायरे में बना रहता है, भले ही उसकी लेखनी महीनों से खामोश हो?

साख का संकट या गिरता रसूख……?
सूत्रों का कहना है कि मुख्यधारा से कटे हुए कुछ तथाकथित वरिष्ठ पत्रकार अपनी गिरती साख को बचाने के लिए ‘पत्रकारिता की साख’ का ढाल के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं। आरोप है कि यह पूरी कवायद उन सक्रिय पत्रकारों को दबाने की एक सोची-समझी रणनीति हो सकती है, जो आज के दौर में सूचनाओं के असली केंद्र बने हुए हैं।

जाँच की आंच में आएंगे कई ‘दिग्गज’!
इस विवाद के बीच सबसे विस्फोटक तथ्य कॉल डिटेल्स और संपर्कों को लेकर सामने आ रहा है। जानकार बताते हैं कि यदि इस मुहिम की आड़ में सक्रियता दिखाने वाले कुछ चेहरों की भूमिका की निष्पक्ष जाँच हो जाए, तो स्थिति उलट सकती है। चर्चा है कि:
इनमें से कई के मोबाइल नंबरों का सीधा जुड़ाव सटोरियों, अपराधियों, शराब ठेकेदार और दो नंबर के अवैध कारोबार करने वालों से मिल सकता है
पर्दे के पीछे से होने वाली ‘मैनेजमेंट’ की राजनीति ने ही वास्तव में इस पेशे को सबसे ज्यादा नुकसान पहुँचाया है।

दोगले मापदंडों पर सवाल
शहर के युवा और मैदानी पत्रकारों का मानना है कि शुचिता की बात करने से पहले खुद के गिरेबान में झांकना जरूरी है। जो लोग खुद संदिग्ध गतिविधियों में संलिप्त रहे हैं या जिनके संरक्षण में अवैध काम फल-फूल रहे हैं, वे आज न्यायधीश बनकर दूसरों के आचरण पर फैसला सुना रहे हैं।

वर्चस्व की लड़ाई’ अब आर-पार के मूड
कटनी की पत्रकारिता में यह ‘वर्चस्व की लड़ाई’ अब आर-पार के मूड में है। यदि वाकई फिल्टर लगाने की तैयारी है, तो इसकी शुरुआत उन ‘बंद कमरों’ की पत्रकारिता से होनी चाहिए जहाँ ख़बरें नहीं, बल्कि सौदेबाजी होती है। अब देखना यह है कि क्या यह जाँच केवल छोटे और सक्रिय पत्रकारों तक सीमित रहती है या फिर उन सफेदपोश चेहरों तक भी पहुँचती है जिन्होंने सालों से पत्रकारिता को अपना सुरक्षित किला बना रखा है।