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June 4, 2026

सच दिखाने की हिम्मत

स्टेट ब्यूरो प्रियंका माली की रिपोर्ट


लेखिका: डॉ. नेहा लोहमारोङ
(पीएच.डी. – अंतरराष्ट्रीय संबंध, जेएनयू, दिल्ली)
अंतरराष्ट्रीय संबंध विशेषज्ञ

भारत और नेपाल के संबंध केवल दो पड़ोसी देशों के राजनयिक समीकरण नहीं हैं, बल्कि यह इतिहास, संस्कृति, धर्म, परंपरा और अटूट सामाजिक विश्वास से बुने हुए रिश्ते हैं। लगभग 1850 किलोमीटर लंबी खुली सीमा, बिना वीजा आवागमन, ‘रोटी-बेटी’ का प्रगाढ़ रिश्ता, जनकपुर-अयोध्या का सांस्कृतिक जुड़ाव, पशुपतिनाथ-काशी की आध्यात्मिक परंपरा तथा भारतीय सेना में शौर्य का परचम लहराने वाले गोरखा सैनिक—ये सभी तत्व प्रमाणित करते हैं कि भारत और नेपाल का रिश्ता सामान्य सीमा राजनीति से कहीं ऊपर एक सभ्यतागत साझेदारी है। 1950 की ‘भारत-नेपाल शांति एवं मैत्री संधि’ ने इन संबंधों को एक औपचारिक और व्यावहारिक आधार दिया। इस संधि के फलस्वरूप दोनों देशों के नागरिकों को व्यापार, आवागमन और रोजगार में अभूतपूर्व सुविधा मिली। जहाँ लाखों नेपाली नागरिकों ने भारत में शिक्षा, व्यवसाय और सैन्य सेवाओं में अपनी पहचान बनाई, वहीं भारत ने नेपाल के विकास, बुनियादी ढांचे और सुरक्षा तंत्र में निरंतर एक विश्वसनीय साझेदार की भूमिका निभाई। उत्तराखंड के धारचूला, पिथौरागढ़ और सीमावर्ती इलाकों में रहने वाले लोगों के लिए यह सीमा कभी दीवार नहीं बल्कि संपर्क का माध्यम रही।
समय के साथ इस अद्वितीय रिश्ते को कई गंभीर कूटनीतिक और सुरक्षात्मक चुनौतियों का सामना करना पड़ा है। 1990 के दशक के बाद भारत की सुरक्षा एजेंसियों के समक्ष एक बड़ी चिंता यह उभरी कि इस खुली और अनइंसुलेटेड सीमा का दुरुपयोग पाकिस्तान की आईएसआई (ISI) और अन्य राष्ट्र-विरोधी तत्वों द्वारा जाली भारतीय मुद्रा (FICN) के नेटवर्क, हथियारों की तस्करी और भारत विरोधी गतिविधियों के लिए किया जाने लगा। यह स्थिति नेपाल पर आरोप लगाने की नहीं, बल्कि दोनों देशों के लिए एक अत्यंत संवेदनशील और साझा सुरक्षा चिंता का विषय थी। खुली सीमा जहाँ आपसी विश्वास का प्रतीक थी, वहीं इसे सुरक्षित और विनियमित रखना भी दोनों पक्षों की सुरक्षा के लिए आवश्यक हो गया। इसी दौर में नेपाल की आंतरिक राजनीति में एक युगांतरकारी परिवर्तन आया। 1996 से शुरू हुआ माओवादी संघर्ष 2006 तक आते-आते राजशाही के अंत और नेपाल के एक धर्मनिरपेक्ष गणराज्य के रूप में तब्दील होने का कारण बना। भारत ने जहाँ अपने यहाँ वामपंथी उग्रवाद (नक्सलवाद) पर सुरक्षा और विकास के मिश्रण से कठोर नियंत्रण पाया, वहीं नेपाल में वामपंथी विचारधारा स्वयं सत्ता की मुख्यधारा और शासन संरचना का हिस्सा बन गई। इस वैचारिक पुनर्संरचना ने क्षेत्रीय भू-राजनीति के समीकरणों को पूरी तरह बदल दिया।
नेपाल की राजनीति में कम्युनिस्ट दलों के प्रभुत्व के साथ ही बीजिंग (चीन) का प्रभाव तेजी से बढ़ा। चीन ने भारी आर्थिक सहायता, बुनियादी ढांचे के विकास (BRI) और रणनीतिक परियोजनाओं के माध्यम से काठमांडू में अपनी पैठ मजबूत की। इसके परिणामस्वरूप, नेपाल की घरेलू राजनीति में भारत-विरोधी रुख को एक राजनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल किया जाने लगा। 2015 की संवैधानिक बहस और सीमा अवरोध के आरोपों ने इस खाई को और चौड़ा किया, जिसने अंततः 2020 के लिपुलेख-कालापानी-लिम्पियाधुरा विवाद का रूप ले लिया। यह विवाद अचानक उत्पन्न नहीं हुआ था, बल्कि इसकी जड़ें 1816 की ‘सुगौली संधि’ की अलग-अलग व्याख्याओं में निहित हैं। एंग्लो-नेपाल युद्ध के बाद ब्रिटिश भारत और नेपाल के बीच हुई इस संधि में नेपाल की पश्चिमी सीमा काली नदी के आधार पर तय की गई थी। विवाद का मूल कारण काली नदी के वास्तविक उद्गम स्थल को लेकर है। भारत का पक्ष यह रहा है कि वह कालापानी क्षेत्र को उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले का अभिन्न हिस्सा मानता है, जहाँ 1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद से ही भारतीय सुरक्षा बल प्रशासनिक और रणनीतिक नियंत्रण के साथ तैनात हैं। दूसरी ओर, नेपाल सुगौली संधि की अपनी व्याख्या के आधार पर इसे दार्चुला क्षेत्र का हिस्सा बताता है। मई 2020 में जब भारत ने धारचूला-लिपुलेख सड़क का उद्घाटन किया, तो तत्कालीन प्रधानमंत्री के.पी. शर्मा ओली ने इसे राष्ट्रीय अस्मिता का मुद्दा बनाकर नेपाल का एक नया राजनीतिक मानचित्र जारी कर दिया, जिसमें भारत के प्रशासनिक नियंत्रण वाले इन क्षेत्रों को शामिल किया गया था।
यहाँ एक बड़ा विरोधाभास भी देखने को मिलता है। समय-समय पर अंतरराष्ट्रीय मीडिया और खुद नेपाली सर्वे रिपोर्टों में हुमला सहित कुछ उत्तरी सीमावर्ती क्षेत्रों में चीनी अतिक्रमण, सैन्य गतिविधियों और नेपाली भूमि पर बीजिंग के दबाव की शिकायतें सामने आईं। लेकिन प्रश्न यह उठता है कि जिस आक्रामकता के साथ नेपाल का राजनीतिक नेतृत्व भारत के साथ सीमा विवाद पर प्रतिक्रिया देता है, वैसी तीव्रता चीन-नेपाल सीमा संबंधी शिकायतों पर क्यों दिखाई नहीं देती? यह दोहरा मापदंड नेपाल के प्रबुद्ध वर्ग और घरेलू राजनीति के भीतर भी गहरी चर्चा का विषय रहा है। हाल के दिनों में नेपाल ने एक और बड़ा राजनीतिक बदलाव देखा, जिसे तथाकथित “Gen-Z Movement” कहा गया। पारंपरिक राजनीतिक दलों और पुराने नेतृत्व की अकर्मण्यता के विरुद्ध युवाओं के भारी असंतोष ने सोशल मीडिया के माध्यम से एक नए चेहरे—बालेन शाह—को सत्ता की मुख्यधारा में लाकर खड़ा कर दिया। एक लोकप्रिय युवा व्यक्तित्व, रैपर और सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में उभरे बालेन शाह ने युवाओं की आकांक्षाओं को भुनाया। विदेशी नामों वाले स्कूलों के नाम बदलने, आत्मनिर्भरता बढ़ाने और विदेशी प्रभाव को कम करने जैसे उग्र-लोकलुभावन (Populist) विचारों ने उन्हें राष्ट्रवाद के नए प्रतीक के रूप में स्थापित किया।
बालेन शाह का यह राजनीतिक उदय विशुद्ध रूप से भारत-विरोधी राष्ट्रवाद की लहर पर सवार था। चुनाव प्रचार के दौरान और मेयर का पद संभालने के बाद भी, उन्होंने अपने आधिकारिक कार्यालय में पीछे नेपाल का वह विवादित नया मानचित्र (Greater Nepal Map) लगा रखा था, जिसमें भारत के लिपुलेख, कालापानी और लिम्पियाधुरा जैसे क्षेत्रों को नेपाल का हिस्सा दिखाया गया था। यह सीधे तौर पर भारत की क्षेत्रीय संप्रभुता को चुनौती देने और युवाओं में भारत-विरोधी भावनाएं भड़काने का एक सोचा-समझा प्रयास था। किन्तु चुनावी रैलियों के नारों और व्यावहारिक कूटनीति में जमीन-आसमान का अंतर होता है। शासन की जिम्मेदारियों के बीच जब संसद में इस नए राजनीतिक नेतृत्व के समक्ष भारत-नेपाल सीमा विवाद का प्रश्न रखा गया, तो बालेन शाह ने एक ऐसा गैर-जिम्मेदाराना बयान दे दिया जिसने कूटनीतिक गलियारों में नया विवाद खड़ा कर दिया। उन्होंने कहा कि केवल भारत ने ही नेपाल की भूमि पर अतिक्रमण नहीं किया है, बल्कि नेपाल के पास भी भारत की कुछ भूमि है।
इस बयान पर जब भारत और नेपाल दोनों तरफ तीखी प्रतिक्रिया हुई और विपक्ष ने स्पष्टीकरण मांगा, तो उनकी पार्टी को डैमेज नियंत्रण के लिए आगे आना पड़ा। उन्होंने सफाई दी कि उनका आशय किसी सैन्य कब्जे से नहीं, बल्कि खुली सीमा और ‘नो मैन्स लैंड’ के आसपास स्थानीय स्तर पर होने वाले छोटे-मोटे व्यावहारिक अतिक्रमणों और सीमा स्तंभों की समस्याओं से था। चूंकि दोनों देशों के किसान सीमा के आर-पार खेती और व्यापार करते हैं, इसलिए ऐसे प्रशासनिक मुद्दे उठना स्वाभाविक है, लेकिन इसे अंतरराष्ट्रीय पटल पर रणनीतिक अतिक्रमण का नाम देना नए नेतृत्व की कूटनीतिक अपरिपक्वता को दर्शाता है। सत्ता में आने के बाद बालेन शाह की हरकतों और निर्णयों में स्थापित कूटनीतिक प्रोटोकॉल की स्पष्ट अनदेखी देखी गई, जिसे विश्लेषकों ने अनावश्यक तनाव बढ़ाने वाला माना।
नेपाल में यह स्थापित परंपरा रही है कि नया नेतृत्व बनने के बाद भारत के साथ उच्चस्तरीय द्विपक्षीय संवाद को प्राथमिकता दी जाती है। किन्तु बालेन शाह ने प्रारंभ में अहंकार दिखाते हुए संकेत दिया कि वे एक वर्ष तक किसी विदेशी यात्रा पर नहीं जाएंगे। इसके अलावा, उन्होंने भारतीय राजदूत से प्रोटोकॉल के तहत अलग से शिष्टाचार मुलाकात करने के बजाय, काठमांडू में सभी विदेशी राजदूतों को एक साथ बुलाकर बैठक की। समर्थकों ने इसे ‘स्वतंत्र विदेश नीति’ कहा, तो वैश्विक विश्लेषकों ने इसे कूटनीतिक अनुभवहीनता माना। इसी तरह, भारत द्वारा धारचूला-लिपुलेख मार्ग से संचालित की जाने वाली ऐतिहासिक कैलाश मानसरोवर यात्रा को लेकर भी नेपाल के इस नए नेतृत्व ने आपत्ति जताई। उनका तर्क था कि जिस क्षेत्र पर नेपाल अपना दावा करता है, उससे जुड़े किसी भी निर्णय में उसे शामिल किया जाना चाहिए, जबकि भारत इसे अपने संप्रभु प्रशासनिक नियंत्रण का हिस्सा मानता है। इसके साथ ही, सीमा क्षेत्रों में भारत से आने वाली वस्तुओं के आवागमन पर अचानक नए नियंत्रण लगाना, स्थानीय स्तर पर भारी कराधान (Taxation) के प्रस्ताव लाना और व्यापार को बाधित करना ऐसे कदम थे, जिन्होंने सदियों पुराने आर्थिक और सामाजिक ताने-बाने को चोट पहुँचाई।
भारत के लिए नेपाल केवल एक पड़ोसी देश नहीं, बल्कि भू-राजनीतिक और सभ्यतागत सुरक्षा का एक अनिवार्य हिस्सा है। भारत अपनी सीमाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने में पूरी तरह सक्षम है। यदि वैश्विक परिस्थितियाँ या सीमा पार की संदिग्ध गतिविधियाँ विवश करती हैं, तो भारत खुली सीमा की प्रकृति को नियंत्रित करने, फेंसिंग लगाने या सुरक्षा जांच को अत्यधिक कड़ा करने जैसे कदम उठाने पर मजबूर हो सकता है। परंतु इसका सीधा और सबसे बड़ा नकारात्मक प्रभाव नेपाल की अर्थव्यवस्था, पारगमन (Transit), दैनिक आपूर्ति और सामाजिक ताने-बाने पर पड़ेगा। राजनीतिक नेतृत्व को यह समझना होगा कि चुनावी लाभ या अल्पकालिक लोकप्रियता के लिए जनभावनाओं और राष्ट्रवाद का अति-लोकलुभावन इस्तेमाल पीढ़ियों से बने ऐतिहासिक विश्वास को नष्ट कर देता है। समाधान टकराव या भड़काऊ बयानों में नहीं, बल्कि ऐतिहासिक दस्तावेजों, तथ्यों और परस्पर सम्मान के आधार पर होने वाले कूटनीतिक संवाद में है। भारत को जहाँ नेपाल की संप्रभुता और उसकी राष्ट्रीय संवेदनशीलताओं का सम्मान करना होगा, वहीं नेपाल के नए नेतृत्व को भी यह स्वीकार करना होगा कि उसकी भौगोलिक, आर्थिक और सांस्कृतिक नियति भारत के साथ ही सुरक्षित है।