स्टेट ब्यूरो रिपोर्ट
डॉ. नेहा लोहामरोड़
संस्थापक एवं निदेशक, कोश फाउंडेशन
आज जब दुनिया भर के समाज मानसिक स्वास्थ्य के संकट, बढ़ती सामाजिक एकाग्रता (अकेलेपन) और परीक्षाओं व प्रदर्शन के मानकों से दबी शिक्षा व्यवस्था से जूझ रहे हैं, तब एक बुनियादी सवाल पर नए सिरे से ध्यान देने की आवश्यकता है: शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य क्या है? सदियों से शिक्षा को केवल ज्ञान प्राप्त करने और आजीविका की तैयारी के एक साधन के रूप में देखा गया है। लेकिन मनुष्य केवल सूचनाओं का संग्रह मात्र नहीं है—विशेषकर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के इस दौर में। हम शारीरिक, भावनात्मक, बौद्धिक, सामाजिक और आध्यात्मिक प्राणी हैं, जिनका विकास इन सभी आयामों के सामंजस्यपूर्ण समन्वय पर निर्भर करता है। आधुनिक मनोविज्ञान और न्यूरोसाइंस (मस्तिष्क विज्ञान) ने इन विचारों को खंगालना तो अब शुरू किया है, लेकिन प्राचीन भारतीय विचारकों ने बहुत पहले ही मानव विकास के लिए एक अत्यंत समग्र ढांचा तैयार कर दिया था: पंचकोश दर्शन।
दो हजार से अधिक वर्ष पूर्व उपनिषद परंपरा के प्रमुख ग्रंथ तैत्तिरीय उपनिषद से उपजा यह दर्शन मनुष्य को पांच परस्पर जुड़े स्तरों या ‘कोशों’ के संयोजन के रूप में देखता है। इस प्राचीन मॉडल की विशेषता इसकी प्राचीनता में नहीं, बल्कि आज के समय में इसकी प्रासंगिकता में है। जब दुनिया भर की शैक्षिक प्रणालियाँ इस बात पर पुनर्विचार कर रही हैं कि २१वीं सदी में बच्चों के समग्र विकास के लिए क्या आवश्यक है, तब पंचकोश ढांचा एक ऐसा दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है जो कालातीत भी है और परिवर्तनकारी भी।
मानव विकास की यह यात्रा शारीरिक स्तर यानी अन्नमय कोश से शुरू होती है। सीखना शरीर से शुरू होता है, जो उच्च संज्ञानात्मक (मानसिक) विकास के लिए एक मजबूत आधार तैयार करता है। इस ढांचे के भीतर खेलकूद, योग, मार्शल आर्ट, पोषण और आउटडोर खेल कोई ‘पाठ्येतर’ (एक्स्ट्रा-करिकुलर) विलासिता नहीं हैं; ये बुनियादी आवश्यकताएं हैं। एक स्वस्थ और सुदृढ़ शरीर ही एक सक्रिय मस्तिष्क का समर्थन करता है, जिससे एक समृद्ध जीवन की नींव पड़ती है।
इस शारीरिक आधार से निकटता से जुड़ा है प्राणमय कोश—जो जीवन शक्ति, श्वास और ऊर्जा का स्तर है। प्राचीन परंपराओं ने मानसिक शांति और एकाग्रता को विकसित करने के लिए प्राणायाम (श्वसन क्रिया) और सचेतनता (माइंडफुलनेस) का उपयोग किया। आधुनिक न्यूरोसाइंस भी इस बात की पुष्टि करता है कि नियमित ध्यान और सचेतनता के अभ्यास सीधे हमारे प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स को सक्रिय करते हैं, जिससे ध्यान केंद्रित करने की क्षमता, कार्यशील स्मृति (वर्किंग मेमोरी) और भावनात्मक संतुलन में सुधार होता है। इस दृष्टिकोण से ध्यान केवल एक थेरेपी नहीं है; यह बुद्धि को धार देने वाला एक शक्तिशाली साधन है।
आंतरिक परिदृश्य में थोड़ा और गहराई से उतरें तो मनोमय कोश—यानी मन और भावनाओं का स्तर—हमारे समय के सबसे बड़े संकटों में से एक को संबोधित करता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, १० से १९ वर्ष की आयु के लगभग सात किशोरों में से एक किसी न किसी मानसिक स्वास्थ्य समस्या से जूझ रहा है। भावनात्मक कल्याण को अब हम दोयम दर्जे की चिंता मानकर नहीं छोड़ सकते। कहानी सुनाने, संगीत, कला और सामाजिक जुड़ाव के माध्यम से शिक्षा को बच्चों में सहानुभूति, मनोवैज्ञानिक लचीलापन और भावनात्मक बुद्धिमत्ता (इमोशनल इंटेलिजेंस) को सक्रिय रूप से बढ़ावा देना चाहिए—ये वे गुण हैं जो आज की अनिश्चित दुनिया में बेहद अपरिहार्य हैं।
यह भावनात्मक संतुलन सीधे विज्ञानमय कोश यानी बुद्धि और विवेक के स्तर को पोषित करता है, जो डिजिटल युग के लिए एक महत्वपूर्ण अंतर्दृष्टि प्रदान करता है। आज के समय में सूचनाएं एक वस्तु बन चुकी हैं; एआई कुछ ही सेकंड में डेटा खोज सकता है, लेख लिख सकता है और बड़े से बड़े डेटासेट का विश्लेषण कर सकता है। जो चीज विशेष रूप से केवल मनुष्यों के पास बची है, वह है ‘विज्ञान’—यानी नैतिक निर्णय लेने की क्षमता, रचनात्मकता, जटिल समस्याओं का समाधान और ज्ञान को एक गहरा अर्थ देने की समझ। यह कोई संयोग नहीं है कि दुनिया की सबसे प्रशंसित शिक्षा प्रणालियाँ—जैसे फिनलैंड, डेनमार्क और सिंगापुर—अब पूरी तरह से रचनात्मकता और आलोचनात्मक सोच (क्रिटिकल थिंकिंग) की ओर रुख कर चुकी हैं। यह वैश्विक बदलाव भारत की राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 के साथ गहराई से मेल खाता है, जो समग्र, बहुविषयक (मल्टी-डिसिप्लिनरी) और व्यावहारिक शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए अपने शुरुआती और स्कूली पाठ्यक्रम में पंचकोश ढांचे को स्पष्ट रूप से शामिल करती है।
मानव अस्तित्व के सबसे गहरे मूल में आनंदमय कोश स्थित है, जो आंतरिक आनंद, सार्थकता और पूर्णता का प्रतिनिधित्व करता है। अभूतपूर्व तकनीकी और आर्थिक प्रगति के बावजूद, आधुनिक समाज तनाव और अकेलेपन की महामारी का सामना कर रहा है। पंचकोश दर्शन हमें याद दिलाता है कि सफलता को केवल ग्रेड, वेतन या कॉर्पोरेट पदों के पैमाने से नहीं मापा जा सकता। वास्तव में शिक्षित व्यक्ति वह है जो जीवन का उद्देश्य खोजता है, समाज के कल्याण में सकारात्मक योगदान देता है और भीतर से एक संतुलन का अनुभव करता है।
इस पांच-स्तरीय खाके का प्रभाव केवल कक्षाओं तक सीमित नहीं है; यह जागरूक पेरेंटिंग, संवेदनशील नेतृत्व और प्रगतिशील सार्वजनिक नीति के लिए एक व्यवस्थित ढांचा प्रदान करता है। यही वह दृष्टिकोण है जिसने कोश फाउंडेशन की स्थापना को प्रेरित किया। इस गहन दर्शन के नाम पर आधारित, यह फाउंडेशन समग्र शिक्षा, रचनात्मक कला, मानसिक कल्याण और महिलाओं व बच्चों के सामाजिक-आर्थिक सशक्तिकरण के माध्यम से इन पांच आयामों को जमीनी स्तर पर क्रियान्वित करने का प्रयास करता है।
आज जब शिक्षक, माता-पिता और नीति निर्माता वैश्विक स्तर पर ऐसे शिक्षण मॉडलों की तलाश कर रहे हैं जो तनाव देने के बजाय हील (स्वस्थ) करें, तब पंचकोश दर्शन एक अत्यंत महत्वपूर्ण मार्गदर्शक के रूप में सामने आता है। शिक्षा किसी बर्तन को केवल जानकारियों से भरना नहीं है, बल्कि एक पूर्ण मानव को भीतर से जगाना है। भविष्य भले ही बुद्धिमान मशीनों का हो सकता है, लेकिन एक सार्थक समाज हमेशा विवेकशील, रचनात्मक, दयालु और संतुष्ट मनुष्यों पर ही निर्भर रहेगा। और शायद, यही सबसे मूल्यवान शिक्षा है।



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