किरण रांका रिपोर्टर


क्रोध से ही कर्म बंध होता है ।हमारा शिविर लगाने का उद्देश्य सभी को संस्कार देना है ।आठ मद बताए जा रहे हैं। अपने पिता, मामा राजा हो तो उसका घमंड नहीं करना चाहिए अर्थात जाति मद नहीं करना चाहिए। अपने सुंदर रूप का ,अपने ज्ञान का, अपनी धन- संपत्ति का, अपनी शक्ति का या बल का घमंड नहीं करना चाहिए ।अपनी तपस्या का और अपनी प्रतिष्ठा का भी घमंड नहीं करना चाहिए। जो घमंड नहीं करता वही अपनी आत्मा के स्वरूप को समझ सकता है ।यदि कोई घमंड करता है तो यही आठ मद संबंधी दोष उसके सम्यक दर्शन को मलिन कर देते हैं ।राजा श्रेणिक ने मुनि पर उपसर्ग किया था तो उन्हें सातवें नर्क में जाना पड़ा था। सम्यक दर्शन नहीं हुआ तो ,कोई भी अच्छी से अच्छी क्रियाएं शुभकारी नहीं, सम्यक दर्शन हो गया तो क्रियाएं कार्यकारी हो जाएगी। अच्छी क्रिया से पुण्य का बंध तो होगा ,लेकिन आत्मा का कल्याण नहीं। सम्यक दर्शन और सम्यक चारित्र के बिना मोक्ष संभव नहीं।
उक्त बातें श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन दिव्योदय अतिशय तीर्थ क्षेत्र किला मंदिर पर पर चल रहे स्याद्वाद शिक्षण एवं संस्कार शिविर को संबोधित करते हुए ब्रह्मचारी संजय भैय्या जी पठारी वाले ने कही। आपने कहा कि सम्यक दर्शन के बिना ज्ञान मिथ्या ज्ञान कहलाता है ।लोगों ने मंदिर को मनोरंजन का केंद्र बना दिया है, विवेक और ज्ञान से क्रिया करें तो आपके कर्मों की निर्जरा होगी ।बिना क्रिया के मोक्ष चाहता है, वह अज्ञानी है ।मूर्खो मैं वहां शिरोमणि है । भव्य जीव सम्यक दर्शन को धारण करें। सुन ले ,समझ ले ,चेताया नहीं तो मनुष्य पर्याय नहीं मिलेगा। बुद्धिमानी आने पर सम्यक ज्ञान आएगा ।मनुष्य पर्याय मिलना दुर्लभ है। सम्यक दर्शन के बिना किसी का भला नहीं हो सकता। कुंदकुंद आचार्य को अपार ज्ञान था। ज्ञानदान के क्षेत्र में पुरुषार्थ करें। दान दे मन हरस विशेखे इस भव जस पर भव सुख देखे। दान चार प्रकार का है। ज्ञानदान में सभी को सहयोग करना चाहिए। ब्रह्मचारी संजय भैय्या ने कहा अब छह अनायतन बताए जा रहे हैं। खोटे गुरु ,खोटे देव,खोटा धर्म और इन तीनों के सेवक या भक्त यह छह अनायतन कहलाते हैं ।इनकी मन, वचन ,काया से प्रशंसा नहीं करना। यदि प्रशंसा करते हैं तो यही छह अनायतन संबंधी दोष सम्यक दर्शन को मलिन कर देते हैं। जिनेंद्र भगवान, निर्ग्रन्थ मुनि और जिनेंद्र भगवान द्वारा कहे गए शास्त्रों के सिवाय अन्य किसी कुदेव,कुगुरु या कुशास्त्र को नमस्कार नहीं करना चाहिए ।यदि नमस्कार करते हैं तो यही तीन मूढता नामक दोष सम्यक दर्शन को मलिन कर देते हैं। आपने कहा कि 25 दोषों से रहित और 8 गुणों से युक्त ऐसे सम्यक दर्शन से जो बुद्धिमान जीव शोभित होते हैं वह यद्यपि चारित्र मोहनिय कर्म के तीव्र उदय से थोड़ा सा भी संयम ,व्रत, नियम नहीं ले पाते तो इंद्र के द्वारा सम्मान पाते हैं ।यद्यपि वे गृहस्थ है तो भी घर गृहस्थी में आसक्त नहीं होते ।जैसे कमल जल में रहते हुए भी उससे भिन्न है या जैसे कीचड़ में पड़ा हुआ होने पर भी स्वर्ण निर्मल बना रहता है, ऐसे ही वह सम्यक दृष्टि घर गृहस्थी के बीच अनासक्त भाव से रहता है।

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