तानसेन समारोह की आठवीं सभा गुरुवार को बेहट में भगवान भोले के मंदिर और झिलमिल नदी के समीप सजी। यह वही जगह थी जहाँ गान महर्षि तानसेन की बाल्यावस्था संगीत साधना और बकरियां चराते हुए बीती थी। घटाटोप कोहरे के बीच जब ब्रह्मनाद के साधकों ने सुर बिखेरे तो ऐसा लगा सम्राट तानसेन के आंगन में सुरीला मौसम उतर आया है। आठवीं संगीत सभा में जली मखमली सुरों की अंगीठी ने सर्द मौसम में गरमाहट ला दी। संगीत कलाकारों ने ऐसा गाया-बजाया कि रसिक सुध-बुध खो बैठे।
सभा की शुरुआत पारंपरिक ढंग से स्थानीय ध्रुपद केन्द्र बेहट के विद्यार्थियों द्वारा प्रस्तुत ध्रुपद गायन के साथ हुई है। राग ” गुनकली” में आलाप ,मध्यलय आलाप और द्रुत लय आलाप से शुरू करके तीव्राताल में बंदिश पेश की। जिसके बोल थे- ‘ बाजे डमरू हरकर बाजे’। ध्रुपद गुरू अभिजीत सुखदाने के निर्देशन में विद्यार्थियों ने पूरे कौशल से इसे पेश किया। इस प्रस्तुति में संजय पंत आगले ने पखावज पर बढ़िया संगत की।

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