महेश पांडुरंग शेंडे की रिपोर्ट
तान्हा पोला का नारा है कि “बच्चे भी किसान का सहारा हैं” और “बैलों से है जीवन हमारा”। यह त्योहार विदर्भ, महाराष्ट्र में मनाया जाता है, जहां बच्चों में कृषि और बैलों के महत्व को समझाने के लिए लाकड़ी नंदी बैलों की शोभायात्रा निकाली जाती है। इस दिन बच्चे लाकड़ी के बैल सजाते हैं और उन्हें लेकर जुलूस निकालते हैं, जिसके बाद उनकी पूजा की जाती है।

यह त्योहार बच्चों को बैलों के महत्व और उनकी मेहनत से समझाता है, जिससे उनमें कृषि के प्रति प्रेम और कृतज्ञता पैदा होती है।
यह विदर्भ की एक खास परंपरा है, जो बच्चों में किसानों और बैलों के प्रति सम्मान की भावना जगाती है।
बच्चे अपने लाकड़ी के बैलों को आकर्षक ढंग से सजाते हैं और उनकी सजावट की प्रतियोगिता होती है, जिसमें विजेताओं को पुरस्कृत किया जाता है।
बच्चे साल भर मेहनत करके लकड़ी के नंदी बैल बनाते हैं, जिन्हें वे पोले के दिन सजाते हैं।
बच्चों की यह शोभायात्रा निकाली जाती है, जिसमें नंदी बैलों को मंदिर तक ले जाया जाता है। वहां उनकी पूजा की जाती है और शिवजी के जयकारे लगाए जाते हैं।
सबसे अच्छी सजावट करने वाले बच्चों को इनाम दिए जाते हैं।
बच्चे अपने घरों में वापस जाते हैं और अपने नंदी बैलों की पूजा करते हैं, फिर वे पड़ोसियों और रिश्तेदारों के घर जाकर बोजारा (भेंट) मांगते हैं।
इस कार्यक्रम को शांतता और सुव्यवस्था स्थापित कर आष्टी पोलिस निरीक्षक श्री विशाल काळे निगरानी में PSI सोमनाथ पवार, PSI ताराम, PSI मेश्राम, और ट्रॉफीक पोलिस प्रताप तोग्गावार का महत्वपूर्ण योगदान रहा ।

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