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February 15, 2026

सच दिखाने की हिम्मत

7 अक्टूबर का काला दिन: जब हमास ने मानवता को लहूलुहान किया”

कर्नल देव आनंद लोहामरोड़

7 अक्टूबर 2023 की सुबह लगभग साढ़े छह बजे, गाज़ा पट्टी से दागे गए रॉकेटों ने इज़राइल के दक्षिणी आसमान को आग की लपटों में बदल दिया। इस्लामिक संगठन हमास ने एक साथ एक सौ उन्नीस स्थानों पर समन्वित हमला किया। स्देरोत, बेईरी, कफ़र अज़ा, रेईम और सूफा जैसे कस्बे इस हमले की पहली चोट बने। कफ़र अज़ा में हमास के आतंकवादियों ने बासठ निर्दोष नागरिकों की हत्या की, महिलाओं से बलात्कार किया और बच्चों को गोलियों से भून दिया। स्देरोत में सुबह छह बजकर अट्ठावन मिनट पर पुलिस थाने पर हमला कर त्रेपन्न लोगों को मार डाला गया। इस एक दिन में एक हज़ार एक सौ पचानवे लोगों की जान चली गई — जिनमें सात सौ छत्तीस नागरिक और तीन सौ उन्नहत्तर सुरक्षाकर्मी शामिल थे।

इज़राइल ने उसी शाम स्थिति को “राष्ट्रीय आपदा” घोषित किया। प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने राष्ट्र को संबोधित करते हुए कहा — “हम युद्ध में हैं, और हम इसे अंत तक लड़ेंगे।” इसके तुरंत बाद, आठ अक्टूबर 2023 को इज़रायली सुरक्षा मंत्रिमंडल ने गाज़ा पट्टी पर पूर्ण नाकाबंदी लागू की। रक्षा मंत्री योआव गैलेंट ने घोषणा की — “अब गाज़ा को बिजली, पानी, ईंधन और भोजन कुछ नहीं मिलेगा।” यही से शुरू हुआ इज़राइल का भीषण प्रतिआक्रमण — “लोहे की तलवार अभियान”, जिसका उद्देश्य था हमास की हर सैन्य क्षमता को समाप्त करना।

नौ अक्टूबर 2023 को इज़रायली वायुसेना ने गाज़ा के नगर, ख़ान यूनिस और रफ़ाह क्षेत्रों पर भीषण बमबारी की। अस्पताल, घर और शरणार्थी शिविर तक निशाने पर आ गए। ग्यारह अक्टूबर को नेतन्याहू ने विपक्षी नेताओं के साथ मिलकर आपातकालीन युद्ध सरकार गठित की ताकि कोई राजनीतिक रुकावट न रहे। बारह अक्टूबर को गाज़ा के दस लाख नागरिकों को दक्षिण की ओर जाने का निर्देश दिया गया — युद्ध के इतिहास में यह सबसे बड़ा नागरिक विस्थापन था।

युद्ध का सबसे विवादास्पद क्षण सत्रह अक्टूबर 2023 को आया, जब गाज़ा नगर के अल-अहली अरब अस्पताल में विस्फोट हुआ। लगभग एक सौ लोगों की मौत हुई। हमास ने इसे इज़रायल का हमला बताया, जबकि इज़रायल ने साक्ष्य देकर स्पष्ट किया कि यह विस्फोट इस्लामिक जिहाद संगठन के रॉकेट के समय से पहले फटने के कारण हुआ। इस घटना ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर तीखी बहस छेड़ दी। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद दो भागों में बँट गई — एक पक्ष ने इज़रायल की निंदा की, तो दूसरा हमास के आतंकवादी कृत्यों की आलोचना करता रहा।

सत्ताईस अक्टूबर 2023 को इज़रायल ने गाज़ा में ज़मीनी सेना भेजी और अभियान के दूसरे चरण की शुरुआत की। टैंकों और तोपों की गर्जना के बीच हमास की सुरंगें, रॉकेट भंडार और कमांड केंद्र नष्ट कर दिए गए। चौबीस नवंबर 2023 को क़तर और मिस्र की मध्यस्थता से सात दिन का युद्धविराम लागू हुआ। इस दौरान हमास ने एक सौ पाँच बंदकों को छोड़ा, जबकि इज़रायल ने दो सौ चालीस फ़िलिस्तीनी बंदियों को रिहा किया। पर यह शांति अस्थायी साबित हुई — एक दिसंबर 2023 को हमास ने फिर रॉकेट दागे और इज़रायल ने बमबारी जारी रखी।

जनवरी 2024 से मार्च 2024 के बीच गाज़ा के उत्तरी क्षेत्र लगभग समाप्त हो चुके थे। एक जनवरी 2025 को नया युद्धविराम हुआ, जो उन्नीस जनवरी तक चला, लेकिन अठारह मार्च 2025 को हमास की ओर से पुनः रॉकेट दागे गए। इज़रायल ने जवाब में “लोहे की तलवार अभियान का दूसरा चरण” शुरू किया। इस दौरान गाज़ा के भीतरी भागों में आतंकवादियों की सुरंगें नष्ट की गईं। सोलह मई से उन्नीस अगस्त 2025 के बीच तीसरा चरण चला, जिसमें रफ़ाह और दक्षिणी गाज़ा के हिस्सों में भयंकर लड़ाई हुई। तीस हज़ार से अधिक लोग मारे गए और हमास के कई प्रमुख कमांडर ढेर हुए। बीस अगस्त 2025 को इज़रायल ने घोषणा की कि अब अंतिम सफाई अभियान चल रहा है।

भारत ने इस हमले की तीखी निंदा की। सात अक्टूबर 2023 को ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा — “हमास का यह हमला अमानवीय और निंदनीय है। भारत निर्दोष नागरिकों के साथ खड़ा है और आतंकवाद का हर रूप विरोध करता है।” भारत ने मानवीय सहायता भेजने की घोषणा की और मध्य-पूर्व में शांति बहाल करने का आग्रह किया। भारत का रुख स्पष्ट था — आतंकवाद के खिलाफ जीरो सहिष्णुता और नागरिकों की सुरक्षा के प्रति संवेदनशीलता।

संयुक्त राज्य अमेरिका की भूमिका इस संघर्ष में निर्णायक रही। आठ अक्टूबर 2023 को तत्कालीन राष्ट्रपति जो बाइडेन ने इज़रायल के समर्थन की घोषणा की। इसके बाद अमेरिका ने “लोहे का गुंबद रक्षा प्रणाली” के लिए अतिरिक्त मिसाइलें और सैन्य उपकरण भेजे। सत्रह अक्टूबर को अमेरिकी युद्धपोत जार्ज आर. फोर्ड को भूमध्य सागर में तैनात किया गया। जनवरी 2025 में डोनाल्ड जे. ट्रम्प ने राष्ट्रपति पद की शपथ ली और इज़रायल के समर्थन में और अधिक कठोर नीति अपनाई। पाँच अक्टूबर 2025 को राष्ट्रपति ट्रम्प ने अपने वक्तव्य में कहा “या तो हमास का अंत होगा, या वह मानवता का अंत कर देगा”। यह वाक्य उस दृढ़ नीति का प्रतीक था, जिसमें अमेरिका ने आतंकवाद को केवल एक क्षेत्रीय समस्या नहीं बल्कि सम्पूर्ण मानव सभ्यता के लिए खतरा माना।

इस युद्ध के पीछे सबसे गहरी परछाई ईरान की है। हमास, हिज़्बुल्लाह और यमन के हूथी विद्रोही — ये सभी ईरान के “प्रतिनिधि संगठन” हैं। अमेरिकी खुफ़िया रिपोर्टों के अनुसार, हमास के अधिकांश रॉकेट, ड्रोन और विस्फोटक ईरान से पहुँचे। जुलाई 2024 में हिज़्बुल्लाह ने इज़रायल के उत्तरी हिस्से पर मिसाइलें दागीं, जिससे संघर्ष का दायरा और बढ़ गया। ईरान का उद्देश्य स्पष्ट था — अमेरिका और इज़रायल को थकाना और अपने प्रभाव को क्षेत्र में बनाए रखना। लेकिन अब अंतरराष्ट्रीय दबावों और आंतरिक आर्थिक संकट के कारण ईरान की स्थिति भी डगमगाई हुई है।

आज जब इस हमले को पूरे दो वर्ष बीत चुके हैं, सात अक्टूबर 2025 की यह दूसरी वर्षगांठ मानवता को याद दिलाती है कि आतंकवाद केवल सीमाओं का नहीं, बल्कि नैतिकता और अस्तित्व का प्रश्न है। गाज़ा की धरती अब भी खंडहरों में तब्दील है, इज़रायल के घर अब भी अपने खोए लोगों के दर्द में डूबे हैं। हमास और उसके समर्थकों ने जो बीज बोया, उसने पूरे मध्य-पूर्व को जला दिया। राष्ट्रपति ट्रम्प के शब्द — “या तो हमास का अंत होगा, या मानवता का” — आज पूरी दुनिया के लिए चेतावनी हैं।

यह वर्षगांठ केवल एक तारीख नहीं, बल्कि वह स्मृति है जब मानव सभ्यता ने आतंक के सबसे काले चेहरे को देखा। अब दुनिया के सामने एक ही विकल्प बचा है — एकजुट होकर आतंकवाद को जड़ से समाप्त करना। क्योंकि जब तक आतंक जिंदा रहेगा, तब तक शांति केवल एक अधूरा सपना बनी रहेगी।