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Dharmendra Singh

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सच दिखाने की हिम्मत

पांचो दिशाओं से पाकिस्तान की घिरती तबाही — आतंक, विद्रोह और भीड़तंत्र के बीच बिखरता राष्ट्र…

कर्नल देव आनंद लोहामरोङ, रक्षा विशेषज्ञ

दक्षिण एशिया में भू-राजनीतिक अस्थिरता का नया दौर शुरू हो चुका है। ठीक उसी समय जब अफगानिस्तान के विदेश मंत्री मौलवी अमीर ख़ान मुत्ताक़ी रूस की यात्रा के बाद नई दिल्ली में कूटनीतिक वार्ताओं के लिए पहुंचे हुए हैं, पाकिस्तान ने एक अप्रत्याशित कदम उठाते हुए 10 अक्टूबर 2025 को अफगानिस्तान की राजधानी काबुल के नज़दीक हवाई हमला किया। पाकिस्तान का यह दावा था कि उसने तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) के ठिकानों को निशाना बनाया, लेकिन अफगान सरकार ने इसे “अवैध आक्रमण” करार देते हुए अगले ही दिन, यानी 11 और 12 अक्टूबर 2025, सीमा पार ड्यूरंड लाइन पर काउंटर-अटैक कर दिया। अफगान रक्षा मंत्रालय ने घोषणा की कि इस जवाबी कार्रवाई में 58 पाकिस्तानी सैनिक मारे गए, जबकि पाकिस्तान ने अपने नुकसान को “सीमित” बताया। इस घटनाक्रम ने यह साबित कर दिया कि पाकिस्तान अब न केवल अपनी सीमाओं के भीतर बल्कि पड़ोसी देशों के साथ भी खुले संघर्ष के दौर में प्रवेश कर चुका है — और यह वही स्थिति है जहाँ से किसी राष्ट्र का पतन शुरू होता है।

पाकिस्तान इस समय हर दिशाओं से उठते संकटों के घेरे में फँस चुका है, और हर मोर्चा उसके अस्तित्व के लिए एक नया खतरा बन गया है। 11 अक्टूबर 2025 को उत्तर में खैबर पख़्तूनख्वा प्रांत के डेरा इस्माइल खान ज़िले में आतंकवादी संगठन तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) ने पुलिस प्रशिक्षण केंद्र रट्टा कुलाची (Ratta Kulachi) पर आत्मघाती ट्रक बम धमाका और गोलीबारी की, जिसमें 7 पुलिस अधिकारी मारे गए और 13 घायल हुए। यह हमला साबित करता है कि TTP, जिसे कभी “काबू में” बताया गया था, अब पाकिस्तान के भीतर फिर से मज़बूती से लौट आया है।

दक्षिण में, उसी दिन यानी 11 अक्टूबर 2025 की रात, बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी (BLA) ने क्वेटा–कराची मार्ग पर चलने वाली ज़फ़र एक्सप्रेस पर दोबारा हमला किया — यह वही ट्रेन है जिस पर इसी वर्ष मार्च में भी हमला हुआ था। इस बार भी विस्फोट में कई सैनिक और नागरिक घायल हुए, और BLA ने बयान जारी करते हुए कहा कि “जब तक बलूचिस्तान को पाकिस्तानी कब्ज़े से मुक्त नहीं किया जाता, तब तक हर सरकारी प्रतीक निशाना बनेगा।”

उत्तर-पूर्व में 12 अक्टूबर 2025 को पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (POK) के मीरपुर, कोटली और मुज़फ्फराबाद में हज़ारों स्थानीय नागरिक सड़कों पर उतर आए। लोगों ने “पाकिस्तान मुर्दाबाद” और “हमें आज़ादी चाहिए” के नारे लगाते हुए सेना और प्रशासन के ख़िलाफ़ प्रदर्शन किया। हालात इतने बिगड़े कि पाकिस्तानी सैनिकों ने गोलियाँ चलाईं, जिसमें कई प्रदर्शनकारी घायल हुए और कुछ सैनिकों को भी भीड़ ने घेरकर मार डाला।

इसी अंदरूनी उथल-पुथल के बीच, देश के भीतर चार विशाल जनसैलाब पाकिस्तान की सड़कों पर उमड़ पड़े हैं, जिन्होंने पूरे देश को गृहयुद्ध जैसी स्थिति में धकेल दिया है। पहली भीड़ लाहौर के मॉडल टाउन से निकलकर रायविंड रोड स्थित शाहबाज़ शरीफ़ के आवास की ओर बढ़ रही है, जिसका नेतृत्व उनके ही दल के असंतुष्ट नेता राना नसीर और अब्दुल सईद कर रहे हैं। इनकी मांग है कि शाहबाज़ सरकार इस्तीफ़ा दे और किसानों की बंद की गई सब्सिडी तुरंत बहाल की जाए। दूसरी भीड़ कराची के लांधी औद्योगिक क्षेत्र से उठी है, जो मंत्री मुनीर हुसैन के डिफेंस फेज़-VIII स्थित घर की ओर बढ़ रही है। इसे ट्रेड यूनियन काउंसिल के प्रमुख शौकत अली बलोच नेतृत्व दे रहे हैं। वे अमेरिकी कंपनियों को बेचे गए सरकारी कारखानों की वापसी और बेरोज़गार मज़दूरों के पुनर्नियोजन की मांग कर रहे हैं। तीसरी भीड़ पेशावर के हयाताबाद चौक से शुरू होकर इस्लामाबाद की अदीयाला जेल की ओर बढ़ रही है, जहाँ इमरान खान बंद हैं। इस आंदोलन का नेतृत्व असद क़ैसर और शरीफ़ खोसा कर रहे हैं, जिनकी मांग है — “इमरान को रिहा करो, चुनाव करवाओ और सेना की राजनीति खत्म करो।” वहीं चौथी भीड़ मुल्तान से निकली है, जिसमें तहरीक-ए-लब्बैक पाकिस्तान (TLP) और जमात-ए-इस्लामी के मौलाना साबिर रिज़वी और हाफ़िज़ अमजद क़ासमी के नेतृत्व में लाखों लोग कराची की शाहरा-ए-फैसल की ओर बढ़ रहे हैं। यह भीड़ अमेरिका और इसराइल के विरोध तथा फिलिस्तीन के समर्थन में नारे लगा रही है, यह कहते हुए कि पाकिस्तान सरकार ने वाशिंगटन के दबाव में मुस्लिम उम्मा के साथ विश्वासघात किया है।

इन सभी घटनाओं को जोड़कर देखें तो पाकिस्तान आज पांच दिशाओं से जलता हुआ देश बन गया है — उत्तर में TTP का हमला, दक्षिण में बलूचिस्तान की बगावत, पश्चिम में अफगानिस्तान का प्रतिशोधी हमला, उत्तर-पूर्व में POK का जनविद्रोह एवं अंदरूनी तौर पर चारों दिशाओं से उठती यह भीड़ — राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक और आर्थिक असंतोष का संगम —अब उसका संकट केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि राष्ट्रीय अस्तित्व का प्रश्न बन चुका है।

इन सब घटनाओं का संयुक्त प्रभाव यह दर्शाता है कि पाकिस्तान अब उस अवस्था में पहुँच चुका है जहाँ शासन, सेना, और जनता के बीच का रिश्ता पूरी तरह टूट चुका है। एक तरफ सीमाओं पर आतंक, विद्रोह और विदेशी हमले, तो दूसरी तरफ सड़कों पर जनसैलाब, धार्मिक उन्माद और आर्थिक गुस्सा — यह मिश्रण किसी भी राष्ट्र को भीतर से फाड़ देने के लिए पर्याप्त है। पाकिस्तान के लिए अब केवल दो रास्ते बचे हैं — या तो वह सत्ता-संरचना का पुनर्गठन करके जनता का विश्वास लौटाए, या फिर धीरे-धीरे उसी दिशा में बढ़े जहाँ 1971 में ढाका गया था। आज का पाकिस्तान केवल संकटग्रस्त नहीं, बल्कि टूटने की दहलीज़ पर खड़ा है — एक ऐसा राष्ट्र जो चार दिशाओं से जल रहा है, और जहाँ हर नई लपट उसके अस्तित्व की एक और परत को राख में बदल रही है।