डिविजन चीफ इश्तियाक चौधरी की रिपोर्ट
द्वारा: कर्नल देव आनंद गुर्जर
सुरक्षा एवं अंतर्राष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञ….
जम्मू-कश्मीर की वादियों में जब ऋतुएं बदलती हैं, तो पहाड़ों की खामोशी को तोड़ती एक प्राचीन लय गूंजने लगती है। यह लय है उन लाखों पैरों की, जो सदियों से जम्मू के मैदानों से लेकर कारगिल, उड़ी, पुंछ, कुपवाड़ा और गांदरबल की दुर्गम ऊंचाइयों तक हजारों किलोमीटर का सफर तय करते हैं। लेकिन आज जब पूरी दुनिया आधुनिक विकास, चमचमाती सड़कों, बिजली, पानी और डिजिटल शिक्षा का आनंद ले रही है, तब इस धरती के ‘प्राकृतिक स्पीड ब्रेकर’ कहे जाने वाले घुमंतू गुर्जर-बकरवाल समाज का जीवन आज भी घोड़ों और खच्चरों की पीठ पर बंधा हुआ है।
यह लेख केवल एक समुदाय के प्रवास की कहानी नहीं है, बल्कि भारत की संप्रभुता के लिए दिए गए उनके अद्वितीय बलिदानों और आज के दौर में उनके अस्तित्व के संघर्ष का एक जीवंत दस्तावेज है।


१. कौन हैं घुमंतू गुर्जर-बकरवाल? (भौगोलिक और जनसांख्यिकीय परिचय):-
गुर्जर-बकरवाल जम्मू-कश्मीर की कुल आबादी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा (लगभग 12% से अधिक) हैं। यह समाज मुख्य रूप से दो हिस्सों में बंटा है—एक जो स्थायी रूप से बस चुके हैं, और दूसरे जो पूरी तरह ‘घुमंतू’ (Nomadic) हैं। घुमंतू बकरवाल हर साल अप्रैल के महीने में चिलचिलाती गर्मी से बचने और अपने मवेशियों (भेड़-बकरियों) के चारे के लिए पीर पंजाल और हिमालय की ऊंची चोटियों की ओर रुख करते हैं। अक्टूबर आते-आते, जब बर्फबारी पहाड़ों को ढक लेती है, यह कारवां वापस मैदानी इलाकों की ओर लौट आता है। पुंछ से कारगिल तक फैला यह दुर्गम रास्ता किसी समय इन्हीं चरवाहों के पूर्वजों ने अपने पैरों से गढ़ा था, जिन पर आज आधुनिक सड़कें और सुरंगे बनी हैं।
२. घुमंतू जीवन की कड़वी हकीकत और अदृश्य नुकसान
बाहर से देखने वाले पर्यटकों के लिए यह प्रवास किसी लोककथा के जीवंत चित्र जैसा सुंदर लग सकता है, लेकिन इसके पीछे छिपी मानवीय त्रासदी रूह कपा देने वाली है:-
@ शिक्षा से पूर्ण वंचित बचपन: वर्ष के 12 महीनों में से 4 से 6 महीने केवल आवागमन में बीत जाते हैं। ऐसे में इस समाज के बच्चे कभी स्कूल का मुंह नहीं देख पाते। शिक्षा के अभाव में नई पीढ़ी का भविष्य भी उसी अनिश्चितता के गर्त में धकेल दिया जाता है।
@ स्वास्थ्य और मातृत्व की चुनौतियां: इस कठिन यात्रा के दौरान महिलाओं को सड़क किनारे या जंगलों में, बिना किसी चिकित्सा सहायता के बच्चों को जन्म देना पड़ता है। बीमार होने पर न कोई डॉक्टर होता है, न दवाई।
@ विकास की दौड़ में सबसे पीछे: जब देश का आम नागरिक सुख-सुविधाओं का उपभोग कर रहा है, तब यह समाज आज भी बुनियादी अधिकारों (बिजली, साफ पानी, पक्के मकान) से कोसों दूर आदिम परिस्थितियों में जीने को मजबूर है।
३. ₹१ की नौकरी और वफादारी का इतिहास: सेना के साथ वो दौर जब कोई आगे नहीं आता था
आज का कश्मीर बदल चुका है, सड़कें बन गई हैं, गाड़ियां आ गई हैं और संचार के साधन मौजूद हैं। लेकिन इतिहास के पन्नों को पलटना होगा। 1947 से लेकर साल 2000 तक, जब बॉर्डर इलाकों में परिस्थितियां अत्यंत कठिन थीं, न तो रास्ते थे और न ही सेना की मदद के लिए कोई आगे आता था, तब यही गुर्जर-बकरवाल और कुछ स्थानीय पहाड़ी लोग थे जो मात्र ₹१ की नौकरी (दिहाड़ी) पर सेना के पोर्टर (कुली) बना करते थे।
आतंकवाद के उस खौफनाक दौर में, जब आतंकी कमांडर सेना की मदद करने वालों को सीधे मौत के घाट उतार देते थे, तब घाटी के अन्य लोग डर के मारे सेना के साथ चलने से कतराते थे। उस दौर में भी अपनी जान की परवाह न करते हुए केवल इस देशभक्त समाज के युवाओं ने सेना का साथ दिया, उनके पोर्टर बने, उनके साथ राशन-हथियार लेकर बर्फबारी में पैदल चले और उनका पूरा जीवन सेना के कैंपों के इर्द-गिर्द बसर हुआ।
४. राष्ट्रभक्ति और अद्वितीय बलिदान: ‘हिल काका’ से ३७ वीरों की गाथा:-
गुर्जर-बकरवाल समुदाय का इतिहास इस बात का गवाह है कि यह समाज भारत माता का एक सजग और निष्ठावान प्रहरी रहा है।
@ सेना के आंख और कान: उस दौर में जब भारतीय सेना के पास न तो सैटेलाइट तकनीक थी और न ही नाइट विज़न उपकरण, तब ये चरवाहे ही थे जो बर्फबारी के बीच बिना जूतों के सेना तक राशन, पानी और दवाइयां पहुंचाते थे और आतंकियों की सटीक खुफिया जानकारी देते थे।
@ हिल काका ऑपरेशन और विलेज डिफेंस कमेटी: ‘ऑपरेशन सर्प विनाश’ (हिल काका) के दौरान इस समाज ने भारतीय सेना का न केवल विश्वास जीता, बल्कि कंधे से कंधा मिलाकर जंग लड़ी। सेना द्वारा प्रशिक्षित इस समाज के ३७ वीर युवाओं ने राष्ट्र की एकता और अखंडता के लिए अपने प्राणों का सर्वोच्च बलिदान दिया। इसी राष्ट्रभक्ति की नींव पर आगे चलकर ‘विलेज डिफेंस कमेटियों’ (VDC) का गठन हुआ।
@ अनुच्छेद ३७० और राष्ट्रीय मुख्यधारा: जब ३१ अक्टूबर २०१९ को अनुच्छेद ३७० को हटाया गया, तब घाटी में शांति और सामान्य स्थिति बहाल करने में इंटरनेशनल गुर्जर महासभा के कार्यकर्ताओं और राष्ट्रीय व प्रांतीय नेतृत्व ने सफेद पगड़ी पहनकर देश का साथ दिया। यदि यह देशभक्त समाज सेना के साथ खड़ा न होता, तो कश्मीर में सामान्य स्थिति बहाल करने में कई दशक और लग जाते।
५. आधुनिकता की मार, लेबर ऑफिस का भ्रष्टाचार और व्यवस्थागत शोषण:-
आज जब पोर्टर की नौकरी में अच्छा पैसा, मान-सम्मान और सुविधाएं मिल रही हैं, तो इस देशभक्त समाज की पीढ़ियों को व्यवस्था से बाहर धकेला जा रहा है।
@ पोर्टर भर्तियों में अन्याय: आज जब रास्ते सुगम हो गए हैं, तो कश्मीर के दूर-दराज के और मैदानी इलाकों के लोग आकर इन बॉर्डर एरिया की पोर्टर नौकरियों पर कब्जा कर रहे हैं। भारतीय सेना की नई पोर्टर कंपनियों में इन स्थानीय और वफादार लोगों की जगह दूसरों को प्राथमिकता दी जा रही है। यह समाज पढ़ाई या आधुनिक ड्रिल्स में उनका मुकाबला भले न कर पाए, लेकिन इनकी सदियों पुरानी वफादारी और कड़े पर्वतीय जीवन का कोई मुकाबला नहीं है।
@ लेबर ऑफिस का भ्रष्टाचार: साल 2000 तक लेबर ऑफिसर्स के पास गुर्जर-बकरवालों के अलावा कोई विकल्प नहीं होता था, क्योंकि दुर्गम और खतरनाक इलाकों में सिर्फ यही जाने का साहस रखते थे। लेकिन आज यह विभाग भ्रष्टाचार का अड्डा बन चुका है, जहां नियमों को ताक पर रखकर बाहरी और रसूखदार लोगों को भर्ती कर स्थानीय युवाओं का हक छीना जा रहा है।
@ ’बीकन’ (Beacon) और विकास परियोजनाओं में उपेक्षा: सीमा सड़क संगठन (BRO/Project Beacon) और बड़े-बड़े ठेकेदारों को आतंकवाद के दौर में जब मजदूर नहीं मिलते थे, तब इसी समाज ने खून-पसीना बहाकर सड़कें बनाईं। आज बीकन के स्थानीय प्रोजेक्ट्स में भी इस समाज की अनदेखी की जा रही है, जिससे युवाओं में गहरा असंतोष है।
६. भविष्य की राह: इंटरनेशनल गुर्जर महासभा की प्रमुख मांगें :-
इस घुमंतू समाज को इस कठिन जीवन से निजात दिलाने और एक गरिमापूर्ण जीवन देने के लिए सरकार, उपराज्यपाल (LG) महोदय और भारतीय सेना को तुरंत निम्नलिखित संस्थागत कदम उठाने होंगे:
A. पोर्टर भर्तियों में ८०% स्थानीय आरक्षण लागू करना
भारतीय सेना और रक्षा मंत्रालय को बॉर्डर सेक्टरों के लिए अपनी भर्ती नीति में संशोधन करना चाहिए। एक सख्त नियम बनाया जाए जिसके तहत सभी पोर्टर कंपनियों में ८०% पद केवल स्थानीय गुर्जर-बकरवाल और पहाड़ी लोगों के लिए आरक्षित हों, जो उन बॉर्डर पोस्ट के ठीक आस-पास रहते हैं। शेष २०% पदों को अन्य सामान्य मापदंडों के लिए रखा जा सकता है।
B. ‘बीकन’ (BRO) परियोजनाओं में ५ किलोमीटर का भर्ती दायरा अनिवार्य करना
सीमा सड़क संगठन (प्रोजेक्ट बीकन) और उसके स्थानीय बुनियादी ढांचा ठेकेदारों के लिए यह कानूनी रूप से अनिवार्य किया जाए कि वे सक्रिय प्रोजेक्ट स्थल के ५ किलोमीटर के दायरे में रहने वाले स्थानीय लोगों को ही मजदूरी और काम पर रखें। इससे यह सुनिश्चित होगा कि जिन पूर्वजों ने बंदूकों के साए में इन रास्तों का निर्माण किया, उनके वंशज ही स्थानीय विकास के मुख्य लाभार्थी बनें।
C. ‘कॉलोनी सिस्टम’ के तहत स्थायी पुनर्वास योजना बनाना
इस मजबूर घुमंतू जीवन की कठिनाइयों को समाप्त करने के लिए एक ठोस आवास मॉडल तैयार किया जाए। प्रधानमंत्री आवास योजना (PMAY) के तहत सरकार को जमीन के साथ पक्के मकान देने चाहिए, और ऐसी कॉलोनियां बसानी चाहिए जहां बच्चों के लिए स्कूल और औषधालय (डिस्पेंसरी) की व्यवस्था हो।
D. घुमंतू जनजातियों के लिए अलग से उप-आरक्षण (Sub-Category) बनाना
चूंकि घुमंतू बच्चे साल में ४ से ६ महीने यात्रा में ही बिता देते हैं, इसलिए वे उन स्थायी रूप से बसे आदिवासियों के साथ प्रतिस्पर्धा नहीं कर सकते जिन्हें निरंतर शिक्षा मिलती है। अतः घुमंतू जातियों के लिए एक अलग उप-श्रेणी (आंतरिक आरक्षण) बनाई जाए, जिसमें सरकारी नौकरियों के लिए शैक्षणिक योग्यता मानदंडों (जैसे ८वीं या १०वीं पास) में विशेष छूट दी जाए।
E. मौसमी प्रवास के दौरान बुनियादी सुविधाओं को जमीन पर उतारना
जब तक पूर्ण पुनर्वास की व्यवस्था नहीं हो जाती, तब तक इनके आवागमन के रास्तों को मानवीय बनाया जाए। प्रशासन को जमीनी स्तर पर ‘मोबाइल स्कूल’ और ‘मोबाइल अस्पताल’ प्रभावी ढंग से संचालित करने चाहिए जो इनके डेरों के साथ-साथ चलें। इसके अलावा, राष्ट्रीय राजमार्गों पर इनके और इनके मवेशियों के रुकने के लिए पानी की व्यवस्था वाले स्थान (Halting Points) आरक्षित किए जाएं।
F. फॉरेस्ट राइट एक्ट (FRA) का पूर्ण क्रियान्वयन और बेदखली पर रोक
स्थानीय वन विभाग द्वारा की जाने वाली ज्यादतियों और प्रशासनिक दखल पर तुरंत लगाम लगाई जाए। इनके पारंपरिक कोठों (झोपड़ियों) को तोड़ने और इन्हें बेघर करने की कार्रवाई तुरंत बंद हो। केंद्रीय कानून का सम्मान करते हुए इन्हें वनों में इनके पारंपरिक निवास और आजीविका के अधिकार दर्ज कर दिए जाएं।
G. नियंत्रण रेखा (LOC) के पास पारंपरिक फॉरवर्ड चरागाहों (बहकों) को फिर से खोलना
यद्यपि राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बॉर्डर फेंसिंग (बाड़ लगाना) आवश्यक है, लेकिन इसके कारण देश के इन सबसे वफादार नागरिकों की आजीविका प्रभावित नहीं होनी चाहिए। सेना के नए अधिकारियों को इस समाज के ऐतिहासिक योगदान को समझना होगा। एक आधुनिक और सुलभ सुरक्षा मंजूरी प्रणाली तैयार की जाए ताकि इन्हें फॉरवर्ड क्षेत्रों में अपनी पारंपरिक ‘बहकों’ (चरागाहों) में जाने की अनुमति मिल सके, जिससे ये अपनी भेड़-बकरियां भी चरा सकें और सेना के ‘आंख-कान’ के रूप में पुनः सेवा कर सकें।
निष्कर्ष: देश की चेतना और भारतीय सेना को एक पुकार
प्रकृति कभी जल्दबाजी नहीं करती, फिर भी उसका हर कार्य पूरा होता है। लेकिन क्या देश की सियासत, प्रशासन और हमारी सेना को इन अनमोल देशभक्तों की सुध लेने में और सदियां गंवानी पड़ेंगी?
आज देश के राजनीतिक नेतृत्व, जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल (LG) महोदय और विशेषकर भारतीय सेना के शीर्ष नेतृत्व को अपनी अंतरात्मा को टटोलना होगा। बुरे वक्त के साथियों को अच्छे वक्त में भुला देना भारतीय सेना की संस्कृति और लोकाचार के विपरीत है। जिस समाज ने ₹१ की नौकरी में अपनी जान हथेली पर रखकर भीषण बर्फबारी के बीच सेना को अपनी पीठ पर ढोया, आज उनके बच्चों को चंद रुपयों और नौकरियों के लिए लेबर ऑफिस के भ्रष्टाचार की बलिवेदी पर नहीं चढ़ाया जा सकता।
यह देश कश्मीर पर जिस शांति और तिरंगे का गौरव गान करता है, उसकी नींव में इन सफेद पगड़ी वाले गुर्जर-बकरवालों का पसीना और खून शामिल है। अब समय आ चुका है कि इस घुमंतू जीवन की कड़ियों को तोड़ा जाए और इन्हें विकास की मुख्यधारा में उनका वास्तविक, ऐतिहासिक, नैतिक और संवैधानिक हक दिया जाए। सड़क और मंजिल कुछ देर इंतजार कर सकती हैं, लेकिन एक वफादार और देशभक्त समाज के न्याय की पुकार को अब और अनसुना नहीं किया जा सकता।

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