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July 8, 2026

सच दिखाने की हिम्मत

स्टेट ब्यूरो रिपोर्ट


उपशीर्षक: जहाँ ‘ऑपरेशन सिंदूर’ ने सीमा पार रणनीतिक प्रतिरोधी क्षमता स्थापित की, वहीं ‘ऑपरेशन महादेव’ ने न्याय को उसकी तार्किक परिणति तक पहुँचाया।
कर्नल देव आनंद लोहामरोर
(सुरक्षा एवं अंतर्राष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञ)…

​5 जुलाई 2025 को मिली एक बड़ी कामयाबी ने कश्मीर घाटी में हफ्तों से छाए तनावपूर्ण सन्नाटे को तोड़ दिया। सुरक्षा बलों को एक सटीक और पुख्ता खुफिया जानकारी (एक्शनेबल इंटेलिजेंस) मिली, जिसने पहलगाम नरसंहार के लिए जिम्मेदार और बेहद चालाकी से छिपे आतंकी सेल की सटीक लोकेशन को उजागर कर दिया। इस निर्णायक डेटा के आधार पर, लक्षित क्षेत्र की तुरंत घेराबंदी कर दी गई। यह इस पूरे अभियान का वह महत्वपूर्ण मोड़ था जिसने एक बेहद बारीक, गुप्त और धैर्यपूर्ण तलाश को एक बड़े सैन्य ऐक्शन में बदल दिया—एक ऐसा सैन्य अभियान जिसे आगे चलकर देश ने ‘ऑपरेशन महादेव’ के नाम से जाना।
​इस क्षण की गंभीरता को समझने के लिए, हमें थोड़ा पीछे 22 अप्रैल 2025 को पहलगाम के बैसरन क्षेत्र में जाना होगा। उस दिन जो कायरतापूर्ण कृत्य हुआ, उसने भारत को केवल आक्रोश से नहीं भरा, बल्कि एक स्पष्ट संकल्प में ढाल दिया—न्याय होगा, और पूर्ण होगा। निर्दोष पर्यटकों को बंधक बनाकर, उनका धर्म पूछकर गोलियाँ चलाना और परिवारों के सामने भय का माहौल पैदा करना—यह केवल एक आतंकी हमला नहीं था, बल्कि भारत की संप्रभुता और उसकी बहुसांस्कृतिक आत्मा को चुनौती देने का प्रयास था। इसी क्षण से एक ऐसी मूक और निरंतर प्रक्रिया की नींव पड़ चुकी थी।
​पहलगाम हमले के तुरंत बाद भारत की प्रतिक्रिया दो समानांतर स्तरों पर विकसित हुई। एक तरफ इसका रणनीतिक और अंतरराष्ट्रीय आयाम था, जिसने 7 मई 2025 को ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के रूप में आकार लिया। इस कठोर कार्रवाई ने पाकिस्तान और उसके छद्म युद्ध (Proxy War) के पूरे ढांचे को एक स्पष्ट संदेश दिया कि अब भारत केवल आक्रामक रक्षा नहीं, बल्कि प्रतिशोधात्मक प्रहार की क्षमता रखता है। लेकिन इसी के समानांतर, एक और लड़ाई शुरू हुई—जो अधिक शांत, अत्यधिक धैर्यपूर्ण और बेहद जटिल थी। यह लड़ाई थी उन तीन चिन्हित आतंकियों को ट्रैक करने की, जिन्होंने पहलगाम में निर्दोष नागरिकों की हत्या की थी—और यही सूक्ष्म अभियान अंततः 5 जुलाई के उस निर्णायक मोड़ तक पहुँचा।
​5 जुलाई को मिली इस खुफिया सफलता के बाद, सुरक्षा बलों ने अपनी पेशेवर क्षमता (Professional Competence) का उत्कृष्ट उदाहरण पेश किया। इलाके की 24 राष्ट्रीय राइफल्स के नेतृत्व में रणनीतिक घेराबंदी की गई, चरणबद्ध तरीके से कॉर्डन को छोटा (Close-in) किया गया और आतंकियों को भागने या कोलेटरल डैमेज (नागरिकों को नुकसान) पहुँचाने का कोई अवसर नहीं दिया गया। यह अचानक हुई कोई मुठभेड़ नहीं थी, बल्कि एक सुनियोजित, संयमित और ‘सर्जिकल’ कार्रवाई थी। अंततः जुलाई के अंतिम सप्ताह में यह ऑपरेशन अपनी पूर्ण सफलता पर पहुँचा, जब पहलगाम हमले के मुख्य सूत्रधार—सुलेमान उर्फ फैज़ल जट्ट, हमज़ा अफगानी और जिब्रान—मारे गए। उनके पास से बरामद हथियारों का फॉरेंसिक मिलान भी इसी घटना से जुड़ा पाया गया, जिसने इस सैन्य सफलता को न्यायिक और साक्ष्य के स्तर पर भी पूर्ण बना दिया।
​इस पूरे अभियान की सबसे बड़ी विशेषता इसका संयुक्त परिचालन (Joint Operational Synergy) था। भारतीय सेना, सीआरपीएफ (CRPF) और जम्मू-कश्मीर पुलिस (JKP) ने मिलकर इस ऑपरेशन को अंजाम दिया। सेना ने आउटर कॉर्डन को नियंत्रित किया, सामरिक दबाव बनाया और मुठभेड़ को निर्णायक मोड़ दिया; जम्मू-कश्मीर पुलिस ने सटीक स्थानीय इंटेलिजेंस और नेटवर्क सपोर्ट उपलब्ध कराया; जबकि सीआरपीएफ ने ऑपरेशनल ग्रिड और कानून-व्यवस्था के मोर्चे को मजबूत रखा। यही ‘इंटर-agency कोऑर्डिनेशन’ इस बड़ी सफलता की असली कुंजी थी।
​अब यदि इस पूरे परिदृश्य को व्यापक संदर्भ में देखा जाए, तो एक महत्वपूर्ण प्रश्न उभरता है—ऑपरेशन सिंदूर और ऑपरेशन महादेव में किसकी अहमियत अधिक है? इसका उत्तर सीधा नहीं है, लेकिन बेहद स्पष्ट है। ऑपरेशन सिंदूर ने सीमा पार बैठे आकाओं को दंडित किया और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की ‘रणनीतिक इच्छाशक्ति’ (Strategic Will) को स्थापित किया। लेकिन ऑपरेशन महादेव ने उससे कहीं अधिक गहरी बात कही—उसने यह सिद्ध किया कि भारत की राज्य-सत्ता अपने नागरिकों के खिलाफ हुए अपराधों को कभी भूलती नहीं है और अपराधियों को पाताल से भी खोज निकालने की क्षमता रखती है।
​एक पैदल सैनिक (Infantryman) के दृष्टिकोण से, जो कश्मीर की धरती पर हर दिन अदृश्य खतरों के बीच तैनात रहता है, ऑपरेशन महादेव का महत्व कहीं अधिक व्यक्तिगत और वास्तविक है। उसके लिए यह केवल एक सैन्य अभियान नहीं, बल्कि उस शपथ की पूर्ति है, जिसमें उसने देश की रक्षा और निर्दोषों की सुरक्षा का वचन लिया है। वह बड़े रणनीतिक या अंतरराष्ट्रीय संदेशों को नहीं देखता; वह उस चेहरे को याद रखता है जिसने देश के नागरिकों पर गोली चलाई थी—और उसका हथियार तब तक शांत नहीं होता जब तक वह चेहरा मिटा न दिया जाए।
​यही कारण है कि ऑपरेशन महादेव को केवल तीन आतंकियों के सफाए तक सीमित करके नहीं देखा जाना चाहिए। यह उस सामूहिक विश्वास की पुनर्स्थापना है कि भारत अपने हर एक नागरिक के लिए न्याय सुनिश्चित करेगा, चाहे उसमें कितना भी समय और संसाधन क्यों न लगे। यह उस समेकित प्रणाली की जीत है जहाँ सैन्य शक्ति, खुफिया तंत्र और स्थानीय प्रशासन एक सुर में काम करते हैं।
​अंततः, ऑपरेशन सिंदूर और ऑपरेशन महादेव दोनों ही एक ही सिक्के के दो पहलू थे। एक ने राष्ट्र के भू-राजनीतिक सम्मान की रक्षा की, दूसरे ने देश के आंतरिक आत्मसम्मान को संतुष्ट किया। एक ने बाहरी दुश्मन को चेतावनी दी, दूसरे ने पीड़ितों को पूर्ण न्याय दिया। लेकिन यदि कश्मीर की घाटी, वहाँ के नागरिकों और अग्रिम मोर्चे पर तैनात सैनिक के मन में झाँका जाए, तो ऑपरेशन महादेव की गूंज अधिक गहरी और संतोषजनक सुनाई देती है—क्योंकि यहाँ केवल बदला नहीं, बल्कि न्याय अपनी पूर्णता को प्राप्त हुआ है।