निर्मल मन जन सो मोहि पावा , मोहि छल कपट छिद्र न भावा-महंत रामकिशोर दास शास्त्री,,,,
पोरसा,,,,,
,,,सीतला माता मंदिर साठो में आयोजित श्री संगीतमय श्रीमद्भागवत कथा में आज महंत राम किशोर दास शास्त्री ने कहा कि हमारे लाख प्रयत्न करने के बाद भी हमारे पवित्र हृदय में विकारों का समावेश हो ही जाता है। जिस प्रकार एक बंद कमरे में धूल के कण पहुँच ही जाते हैं और उसे गंदा कर देते हैं, उसी प्रकार विकारों का हमारे अंदर प्रवेश होना एक स्वाभाविक बात है। इसके लिए हम नियमित रूप से कथा का रसपान करने और संतों की वाणी का पान करें तो सभी प्रकार के विकारों से बचा जा सकता है। काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार, ईर्ष्या, द्वेष आदि विकार बाह्य स्थूल स्वरूप के नहीं हैं। अंतः इन विकारों को बाह्य साधनों से शुद्ध नहीं किया जा सकता है। ये विकार तो अंतःकरण पर सूक्ष्म रूप में छाये रहते हैं, इसलिए इसके लिए सूक्ष्म साधनों की आवश्यकता होती है। जैसे, सूर्य की किरणें जो सूक्ष्म हैं, गंध को पवित्र कर देती हैं, उसी प्रकार ये विकार भी स्वच्छ होते हैं, लेकिन परमात्मा और संतों के प्रकाश को अपने अंदर धारण करने पर यह विकार हट जाते है, श्रीशास्त्री जी ने आंगे कहा कि कथा रसपान करने से यह विकार जो सत्, रज और तम गुणों से प्रभावित रहते हैं, अपनी विषमता को त्यागकर समता में आ जाते हैं। आत्मा का प्रकाश प्रस्फुटित होकर उसी प्रकार दिखने लगता है, जिस प्रकार काई को हटाने पर निर्मल जल दिखाई देने लगता है। ऐसा निर्मल मन ही परमात्मा से साक्षात्कार का अधिकारी बन सकता है, ,,,प्रकृति के कण-कण में भगवान का दर्शन होता है। जिस साधना में प्रेम की मिठास न हो, वह व्यर्थ का शारीरिक परिश्रम है। भक्ति, ज्ञान, योग, साधना ये सभी प्रभु की कृपा-प्राप्ति की सीढ़ियॉं हैं, जिन्हें संसार के प्राणियों से प्रेम नहीं, जिन्हें भगवान की वस्तुओं से प्रेम नहीं, ऐसे कठोर हृदय को भगवान दर्शन नहीं देते उन्होंने कहा कि भगवान शिव कहते है कि निर्मल मन जन सो मोहि पावा,मोहि कपट छल छिद्र न भावा।इसलिए पूजा में प्रेम का भाव सर्वोपरि होना चाहिए। हमारी पूजा में निष्काम भाव का रस होना चाहिए तभी हमें प्रसाद की कामना करनी चाहिए,,,,,
उक्त कथा का आयोजन कुंवर सिंह तोमर, राजा सिंह तोमर, भगवान सिंह तोमर ,लाल सिंह तोमर ,शिशुपाल सिंह तोमर, के द्वारा कराया गया है कथा की व्यवस्था समस्त ग्रामवासी देख रहे हैं,,,,,,,

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