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Dharmendra Singh

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April 10, 2026

सच दिखाने की हिम्मत

स्थान मध्य प्रदेश लोकेशन सिलवानी

नरेन्द्र राय ब्यूरो चीफ

एंकर रायसेन जिले की तहसील सिलवानी नगर के रघुवंशी गार्डन मंगल भवन में पांच दिवसीय रामचरित मानस सम्मेलन का विराट आयोजन किया जा रहा है। जिसमें पांच दिवस पर अध्यक्षता करते हुए वेदाचार्य जी महाराज पंडित राम कृपाल ने कहा कि हमारे जीवन में मर्यादा से जीवन यापन करने की जो शिक्षा है, वह हमें रामचरितमानस से प्राप्त होती है। उन्होंने कहा कि रामचरितमानस में समस्त पात्र अपनी अपनी मर्यादाओं का पूर्ण विवेक के साथ पालन करते हैं। कैकई ने मर्यादा का उल्लंघन किया तो उसका परिणाम परिणाम विवश रहा एवं राम को वनवास जाना पडा। संपूर्ण अयोध्या में कैकई की घोर उपेक्षा की गई। दूसरी ओर भगवान राम ने अपनी पूर्ण मर्यादा का पालन करते हुए पिता के वचन का निर्वाह करने के लिए, वन में चौदह वर्ष तक निवास करना स्वीकार किया ।दूसरी ओर भरत का मर्यादा पालन बहुत अनुकरणीय है, उन्होंने अपने भ्रात प्रेम के वशीभूत होकर, उनको मिला हुआ राज्य स्वीकार न करके, केवल राज्य संचालन का सामान्य भार स्वीकार किया ,एवं चौदह वर्ष के उपरांत प्रभु श्री राम को राज्य हस्तांतरित कर दिया। श्री हनुमान जी अपनी समस्त मर्यादाओं का भली-भांति पालन करते हुए ,उन्हें कभी कर्ता का अभिमान नहीं होता है, और अपने को सामान्य सेवक निरूपित करते हैं। अनेक पात्रों के मर्यादित आचरण के माध्यम से व्यक्ति शिक्षा प्राप्त करता है। जिससे कि उसे सर्वथा मर्यादा से जीवन जीने की शिक्षा जीवन में प्राप्त होती है। वेदाचार्य पंडित राम कृपाल शर्मा
निर्मल कुमार शुक्ला (मानस महारथी) महाराष्ट्र, ब्रह्मचारी परीक्षा पीठा धीश्वर ,श्री राघव रामायणी (झांसी)नगर खेरापति श्री नरेश शास्त्री
ने कहा कि दूसरी ओर महाभारत का वर्णन है, जहां पर कोई भी मर्यादा का पालन नहीं कर रहा है, दुर्योधन ने मर्यादा का पालन नहीं किया। परिणाम स्वरूप भयानक महाभारत का युद्ध हुआ। यहां तक कि भगवान श्री कृष्ण के द्वारा समझाने के बाद भी दुर्योधन नहीं माना, परिणामतः स्वयं के विनाश को वह प्राप्त हो गया। कहने का आशय यह है कि रामचरितमानस की मर्यादा सदैव अनुकरणीय है। इसीलिए रामचरितमानस को एक समग्र जीवन दर्शन के रूप में निरूपित किया जाता है ,जिससे कि मानव सामान्य से सामान्य शिक्षाओं को प्राप्त करके, अपने जीवन को उत्कृष्ट बना सकता है। महाभारत के विषय में वह सम्मान समाज को प्राप्त नहीं हो पाया है, जितना सम्मान रामचरितमानस को प्राप्त है। रामायण को प्राप्त है ,रामायण की मर्यादा ,अनुशासन सदैव अनुकरणीय है ,जो कि हमारी भारतीय परंपरा का एक दिव्य उदाहरण है।