किरण रांका रिपोर्टर

इस पंचम काल में दो प्रकार के तीर्थ हैं एक चैतन्य और दूसरा अचैतन्य। अलीपुर के अशोक जैन ने आचार्य मुनि सुबल सागर महाराज से दीक्षा लेकर अगर्भ सागर महाराज बनकर आत्म कल्याण के लिए सब कुछ छोड़ कर मुनि बन गए। जो 2 परिवारों का नाम रोशन करें वह बेटियां होती है ,उसे कुलदीपक भी कहते हैं। मां जन्म देती है और दूसरा उसका ससुराल होता है। इन दोनों परिवारों में वह अपना विशेष स्थान बनाती है। सभी को पुण्य चाहिए, पुण्य कम होता है तो उसका बेटा गाली देता है ,हाथ तक उठा लेता है ।आज के समय में घर का बेटा ही अपने माता-पिता को आंखें दिखा रहा है। पुण्य दुकानों एवं स्टोरों पर नहीं मिलता। देव शास्त्र गुरु के पास मिलता है जिनवाणी पढ़ने का समय नहीं पुण्य उदय आया तो राष्ट्रपति पद पर एक ऐसी महिला द्रोपदी मुर्मू चुनी गई ,जिसका कभी कोई नाम नहीं चला।
उक्त बातें श्री चंद्र प्रभु मंदिर अरिहंत पुरम में गणाचार्य विराग सागर महाराज के परम प्रभावक शिष्य आचार्य विहर्ष सागर महाराज ने आशीष वचन देते हुए कहीं। आपने कहा कि आप सभी लोग पुण्य को एकत्रित करते रहें, पैसा तो आपके पीछे आएगा, पैसे के पीछे मत भागो। पुण्य वह चुंबक है जो आपको तार देगा। अभागा वह है जिसका देव, शास्त्र, गुरु की कृपा ना मिले।

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