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Dharmendra Singh

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February 2026
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February 16, 2026

सच दिखाने की हिम्मत

सरदारपुर- राहुल राठोड़

सरदारपुर- राजोद नगर के मध्य स्थित शासकीय कन्या उमावि की कक्षा 11 वीं आईटी की छात्राओं ने होलोग्राम 3डी प्रोजेक्टर का निर्माण किया । संस्था के प्राचार्य जितेंद्र कुमार शर्मा के निर्देशन में तैयार हुआ प्रोजेक्टर एक अनूठा प्रोजेक्टर है जो आभासी प्रतिबिंबों को एक वर्चुअल 3-डायमेंशनल इमेज दर्शान के लिए उपयोग में आता है । संस्था के आईटी व्याख्याता डॉ. राहुल व्यास और कक्षा 11 वीं की छात्राओं द्वारा सामूहिक रूप से इस प्रोजेक्टर का निर्माण किया गया इस प्रोजेक्टर को बनाते समय भौतिकी के शिक्षक गौरव साहू द्वारा बताया गया कि होलोग्राम एक तकनीक है जिसका उपयोग चित्र प्राप्त करने के लिए दो अलग अलग तरंगदैर्घ्य वाली लेजर किरणों को एक फोटोग्राफिक प्लेट पर अंकित किया जाता है। इससे पहले दोनों लेजर किरणें एक बीम स्प्रैडर से होकर निकलती हैं, जिससे प्लेट पर लेज़र किरणों का प्रकाश फ्लैशलाइट की भांति जाता है और चित्र अंकित हो जाता है। गणित के व्याख्याता प्रहलाद पटीदार द्वारा बच्चों को कोण की जानकारी प्रदान की गई जिसमें बताया कि किरणों का 3 डी चित्र अंकित करने के लिए फ़ोटोग्राफ़िक प्लेट को 45° के कोण पर रखा जाता है ऐसा करने पर बनने वाला प्रतिबिंब एक 3 डी छवि प्रदान करता है । संस्था की जीवविज्ञान की व्याख्याता पल्लवी पगारे के सहयोग से “बेस्ट आउट-ऑफ-वेस्ट” पद्धति के अनुरूप कार्डबोर्ड और प्लास्टिक की पन्नियों का उपयोग कर होलोग्राम 3डी प्रोजेक्टर का निर्माण किया । कक्षा 9 वीं तथा 11 वीं की बालिकाओं को संस्था के व्याख्याता नन्दराम मदारिया द्वारा होलोग्राम प्रोजेक्टर की कार्यप्रणाली को समझाया गया तथा पृथ्वी और चंद्रमा की घूर्णन गति और 3 डी छवि का परिदर्शन कराया । विद्यालय की शिक्षिका कृष्णा सोनीगर ने बताया कि राष्ट्रीय विज्ञान दिवस विज्ञान से होने वाले लाभों के प्रति समाज में जागरूकता लाने और वैज्ञानिक सोच पैदा करने के उद्देश्य से राष्ट्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद तथा विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय के तत्वावधान में हर साल 28 फरवरी को भारत में मनाया जाता है वहीं विशाखा दूबे ने बताया कि राष्ट्रीय विज्ञान दिवस रमन प्रभाव की खोज के कारण मनाया जाता है। इस खोज की घोषणा भारतीय वैज्ञानिक सर चंद्रशेखर वेंकट रमन (सर चन्द्रशेखर वेंकटरमन ने 28 फरवरी सन् 1928 को की थी। इसी खोज के लिये उन्हे 1930 में नोबल पुरस्कार दिया गया था। कार्यक्रम का संचालन सुल्तान सिंह मेड़ा ने किया ।कार्यक्रम में चेतन चौहान, हरिनारायण चौहान, मुकेश सतपाडिया आदि उपस्थित थे । उक्त जानकारी विद्यालय के शिक्षक आत्माराम मेहता ने दी ।