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Dharmendra Singh

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January 15, 2026

सच दिखाने की हिम्मत

ग्वालियर –

 

फास्ट फूड के दौर में भी सैलानियों की जुबान पर चढ़े हैं मेले के खजले

 

ग्वालियर मेले में भी सजी हैं विविध प्रकार के लजीज खजले की दुकानें

 

आधुनिकता की दौड़ में भले ही चीनी, थाई व अन्य विदेशी फास्ट फूड युवाओं की पहली पसंद बनते जा रहे हैं, पर खासतौर पर मेलों में बिकने वाले खजला व पापड़ जैसे पारंपरिक व्यंजनों की प्रासंगिकता आज भी बनी हुई है। इन व्यंजनों का स्वाद लेने का मजा ही कुछ और है। मेले में सजी-धजी दुकानों पर बैठकर सैलानी बड़े चाव के साथ खजला-पापड़ का लुत्फ उठाते हैं। साथ ही इसकी भीनी-भीनी ताजगी व खुशबू भी महसूस करते हैं। ऐतिहासिक श्रीमंत माधवराव सिंधिया ग्वालियर व्यापार मेला में भी खजले की दुकानें सदैव से आकर्षण का केन्द्र रही हैं। इस बार के मेले में भी विभिन्न प्रकार के लजीज खजले व पापड़ की कई दुकानें सजीं हैं।

मेले के झूला सेक्टर की तरफ अंजलि खजला-पापड़ के नाम से अपनी दुकान लगी है। इस दुकान के संचालक के अनुसार लगभग 60 सालों से ग्वालियर मेले में उनका परिवार दुकान लगाता आया है। पहले प्रमोद कुमार यादव खजले की दुकान लगाते थे, अब उनके बेटे अजय कुमार व सूरज कुमार यादव अपनी पुस्तैनी परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं। यादव परिवार के सदस्यों सहित कुल मिलाकर लगभग 50 कर्मचारी खजले व चाट की यह दुकान चला रहे हैं। खजला-पापड़ की दुकान पर रबड़ी खजला, मलाई खजला, खोए का खजला व दूध का खजला सहित नमकीन व कम मीठे खजले भी खूब बिकते हैं। इसके अलावा पापड़, छोले भटूरे व आलू चाट भी चटपटी चटनी, दही और खट्टे-मीठे व तीखे मसालों के साथ परोसी जाती है।

खजला दुकानदार बताते हैं कि ग्वालियर मेले में आने वाले सैलानी दुकान पर बैठकर तो खजला व चाट का आनंद लेते ही हैं। साथ ही अपने स्वजनों व नाते-रिश्तेदारों के लिये भी खजला पैक कराकर ले जाते हैं, क्योंकि खजला आमतौर पर बाजार में उपलब्ध नहीं होता। खजला ज्यादातर मेलों में ही मिलता व बिकता है। ग्वालियर मेले में लगी खजले की एक बड़ी दुकान के मालिक ने बताया कि औसतन 50 से 60 लाख रूपए की बिक्री हमारी दुकान से हो जाती है।

 

मेलों में ही गुजरती है पूरी साल

 

समय के साथ खान-पान में आए बदलाव के बाबजूद भारतीय पारंपरिक व्यंजन खजले की प्रासंगिकता प्रभावित नहीं हुई है। देश भर के मेलों में आज भी खजले की मांग रहती है। खजला दुकानदार बताते हैं ग्वालियर मेला ही नहीं अन्य बड़े-बड़े मेलों मसलन औरंगाबाद महाराष्ट्र, देवधर (बैजनाथ धाम) झारखंड व भरतपुर राजस्थान के मेले सहित देश के अन्य मेलों में भी हम खजले की दुकान लगाते हैं। इस दौरान मेरे माता-पिता सहित पूरा परिवार साथ में चलता है। इस प्रकार हमारे परिवार का अधिकांश वक्त मेलों में ही गुजरता है।

दीपक सिंह गुर्जर की रिपोर्ट