स्टेट ब्यूरो हेड
लेखक: कर्नल (डॉ.) देव आनंद लोहमरोड़
आधुनिक युद्धों का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। अब किसी राष्ट्र को केवल टैंकों, मिसाइलों या नियमित सेनाओं के माध्यम से चुनौती नहीं दी जाती, बल्कि साइबर हमलों, दुष्प्रचार, आर्थिक दबाव, मानव तस्करी, संगठित अवैध प्रवासन और सामाजिक अस्थिरता जैसे अनेक साधनों का संयुक्त उपयोग भी किया जाता है। रक्षा एवं सामरिक अध्ययन की भाषा में इसे हाइब्रिड युद्ध कहा जाता है। इस प्रकार के संघर्ष का उद्देश्य केवल सीमा भेदना नहीं, बल्कि प्रतिद्वंद्वी राष्ट्र की राजनीतिक, सामाजिक और प्रशासनिक व्यवस्था पर लंबे समय तक दबाव बनाए रखना होता है।


राष्ट्रीय सुरक्षा विशेषज्ञ लंबे समय से इस बात की ओर संकेत करते रहे हैं कि यदि किसी सीमा पर अनियंत्रित और बड़े पैमाने पर लोगों की आवाजाही होती है, तो वास्तविक शरणार्थियों के साथ-साथ अपराधी तत्व, मानव तस्कर, संगठित अपराध से जुड़े लोग, प्रशिक्षित घुसपैठिए अथवा शत्रुतापूर्ण खुफिया एजेंसियों से जुड़े व्यक्ति भी उस भीड़ में शामिल हो सकते हैं। यही कारण है कि अधिकांश देश बड़े पैमाने पर होने वाले अवैध प्रवेश को केवल मानवीय संकट नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा, कानून-व्यवस्था और दीर्घकालिक रणनीतिक चुनौती के रूप में भी देखते हैं। यदि भविष्य में भारत के सामने ऐसी स्थिति उत्पन्न होती है, तो चुनौती केवल अवैध प्रवेश रोकने तक सीमित नहीं होगी, बल्कि पहचान सत्यापन, सुरक्षा जांच और संभावित संगठित नेटवर्क की समय रहते पहचान करना भी उतना ही महत्वपूर्ण होगा।
आधुनिक भू-राजनीति यह भी बताती है कि प्रत्येक बड़े मानवीय संकट के साथ एक समानांतर सूचना युद्ध (Information Warfare) भी चलता है। अंतरराष्ट्रीय मीडिया, सोशल मीडिया, मानवाधिकार संगठन, कूटनीतिक दबाव और वैश्विक जनमत एक ही घटना के अलग-अलग आख्यान प्रस्तुत करते हैं। एक पक्ष उसे मानवीय त्रासदी के रूप में देखता है, जबकि दूसरा उसकी राष्ट्रीय सुरक्षा संबंधी चुनौतियों पर ध्यान केंद्रित करता है। लोकतांत्रिक देशों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही होती है कि वे वास्तविक पीड़ितों की सहायता और अपनी सीमाओं की सुरक्षा के बीच संतुलन कैसे स्थापित करें। इसलिए किसी भी बड़े सीमा संकट का मूल्यांकन केवल भावनाओं के आधार पर नहीं, बल्कि खुफिया सूचनाओं, पहचान सत्यापन और सुरक्षा जोखिमों के व्यापक विश्लेषण के आधार पर किया जाना चाहिए।
भारत के लिए यह विषय और भी अधिक महत्वपूर्ण है क्योंकि उसकी सीमाएँ अनेक संवेदनशील क्षेत्रों से जुड़ी हुई हैं। यदि किसी पड़ोसी क्षेत्र में भविष्य में राजनीतिक, आर्थिक या मानवीय संकट उत्पन्न होता है, तो यह समझना आवश्यक होगा कि जहाँ अधिकांश लोग वास्तव में सहायता की आवश्यकता वाले सामान्य नागरिक हो सकते हैं, वहीं कुछ तत्व संगठित अपराध, मानव तस्करी, आतंकवादी नेटवर्क या शत्रुतापूर्ण खुफिया गतिविधियों से भी जुड़े हो सकते हैं। इतिहास बताता है कि विरोधी शक्तियाँ केवल पारंपरिक सैन्य टकराव पर निर्भर नहीं रहतीं, बल्कि समाज के भीतर दीर्घकालिक प्रभाव स्थापित करने का प्रयास भी करती हैं। इसलिए भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा नीति को किसी भी असामान्य सीमा-पार गतिविधि को मानवीय और सुरक्षा—दोनों दृष्टिकोणों से देखना होगा।
हाल के दिनों में स्पेन के स्यूटा क्षेत्र में बड़ी संख्या में लोगों के सीमा तक पहुँचने और सीमा पार करने की घटनाओं ने पूरे यूरोप में सीमा सुरक्षा, अवैध प्रवासन और राष्ट्रीय सुरक्षा पर नई बहस छेड़ दी है। इन घटनाओं के दौरान सुरक्षा बलों और प्रवासियों के बीच टकराव, सार्वजनिक अव्यवस्था तथा हिंसा की घटनाएँ भी सामने आईं, जिसके बाद स्पेन ने सीमा नियंत्रण को और कड़ा किया तथा यूरोप में बाहरी सीमाओं की सुरक्षा पर चर्चा तेज हो गई। सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि जब किसी सीमा पर अचानक असामान्य जनदबाव उत्पन्न होता है, तो उसके बीच मानव तस्करी नेटवर्क, संगठित अपराध या अन्य सुरक्षा जोखिमों के घुस आने की संभावना को पूरी तरह नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। इसलिए ऐसी घटनाओं को केवल मानवीय संकट नहीं, बल्कि संभावित सुरक्षा चुनौती के रूप में भी देखा जाता है। भारत के लिए भी यह एक महत्वपूर्ण रणनीतिक संकेत है कि यदि भविष्य में उसकी किसी सीमा पर इसी प्रकार का असाधारण दबाव उत्पन्न होता है, तो उससे निपटने के लिए केवल सैन्य तैयारी ही नहीं, बल्कि खुफिया, प्रशासनिक और कानूनी स्तर पर भी समन्वित व्यवस्था आवश्यक होगी।
इतिहास बताता है कि बड़े पैमाने पर विस्थापन अनेक कारणों से होते हैं—युद्ध, राजनीतिक दमन, आर्थिक संकट, जलवायु परिवर्तन और राज्य व्यवस्था का विफल होना। साथ ही, सुरक्षा विशेषज्ञ यह भी चेतावनी देते हैं कि ऐसे संकटों का लाभ संगठित अपराध, मानव तस्करी के गिरोह और उग्रवादी संगठन उठाने का प्रयास कर सकते हैं। इसलिए प्रत्येक बड़े प्रवासन संकट का मूल्यांकन मानवीय और राष्ट्रीय सुरक्षा—दोनों दृष्टिकोणों से किया जाना चाहिए।
भारत इस प्रकार की चुनौती का अनुभव पहले भी कर चुका है। वर्ष 1971 के बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के दौरान लाखों शरणार्थी भारत आए। उस समय मानवीय आधार पर सहायता देना आवश्यक और नैतिक रूप से उचित था। किंतु आने वाले दशकों में अवैध सीमा-पार प्रवासन राष्ट्रीय राजनीति, सुरक्षा और जनसांख्यिकीय संतुलन से जुड़ी बहस का महत्वपूर्ण विषय बन गया। यह अनुभव बताता है कि प्रत्येक बड़े मानवीय संकट के साथ एक व्यापक और दीर्घकालिक सुरक्षा नीति भी आवश्यक होती है। किसी भी लोकतांत्रिक राष्ट्र की सबसे बड़ी परीक्षा यही होती है कि वह मानवीय दायित्व और राष्ट्रीय सुरक्षा के बीच संतुलन बनाए रख सके।
वैश्विक राजनीति का एक दूसरा पक्ष भी है। किसी भी मानवीय संकट के दौरान अंतरराष्ट्रीय मीडिया, वैश्विक संस्थाएँ और विभिन्न वैचारिक समूह अत्यंत सक्रिय हो जाते हैं। कई बार मानवीय पक्ष को अधिक महत्व दिया जाता है, जबकि सुरक्षा संबंधी चिंताओं को अपेक्षाकृत कम स्थान मिलता है। दूसरी ओर सुरक्षा एजेंसियाँ और रणनीतिक विशेषज्ञ इस बात पर बल देते हैं कि बड़े पैमाने पर होने वाली किसी भी अवैध आवाजाही के साथ कठोर पहचान सत्यापन, पृष्ठभूमि जांच और सुरक्षा परीक्षण अनिवार्य होने चाहिए। यही संतुलन किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की वास्तविक कसौटी है।
आज पाकिस्तान गंभीर आर्थिक संकट, राजनीतिक अस्थिरता, आतंकवाद और आंतरिक अशांति जैसी चुनौतियों का सामना कर रहा है। यदि भविष्य में पाकिस्तान या पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर के किसी हिस्से में मानवीय संकट और गहराता है, तो भारत के नीति-निर्माताओं को केवल पारंपरिक सैन्य घुसपैठ ही नहीं, बल्कि संभावित अवैध प्रवासन, मानव तस्करी, जाली दस्तावेज़ों के नेटवर्क और संगठित घुसपैठ जैसी चुनौतियों के लिए भी तैयार रहना होगा। यह एक रणनीतिक संभावना है, न कि किसी पूर्वनिर्धारित योजना का स्थापित तथ्य। इसी कारण सीमाओं की उन्नत निगरानी, मजबूत खुफिया समन्वय और त्वरित पहचान प्रणाली का महत्व पहले की तुलना में कहीं अधिक बढ़ गया है।
भारत की सबसे बड़ी आवश्यकता यह है कि सीमा प्रबंधन केवल बाड़ और चौकियों तक सीमित न रहे। कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित निगरानी, ड्रोन, सेंसर, जैवमेट्रिक पहचान प्रणाली, मजबूत खुफिया समन्वय, त्वरित सत्यापन तंत्र और स्पष्ट कानूनी प्रक्रियाएँ भारत की भविष्य की सीमा सुरक्षा व्यवस्था का अभिन्न हिस्सा बनें। साथ ही, यदि कभी वास्तविक शरणार्थी संकट उत्पन्न होता है, तो उसका समाधान अंतरराष्ट्रीय कानून और मानवीय दायित्वों के अनुरूप किया जाना चाहिए। एक मजबूत राष्ट्र वही होता है जो अपनी सीमाओं की सुरक्षा और मानवीय मूल्यों—दोनों की रक्षा करने में सक्षम हो।
स्पेन की हालिया घटनाओं को भारत के भविष्य का निश्चित पूर्वानुमान कहना उचित नहीं होगा। किंतु इन्हें एक महत्वपूर्ण रणनीतिक चेतावनी के रूप में अवश्य देखा जा सकता है कि 21वीं सदी के संघर्ष अब केवल युद्धक्षेत्रों में नहीं, बल्कि सीमाओं, समाजों, सूचना तंत्र, जनसंख्या की आवाजाही और मनोवैज्ञानिक प्रभावों के माध्यम से भी लड़े जा रहे हैं। इसलिए भारत को भय या अटकलों के आधार पर नहीं, बल्कि तथ्यों, तकनीकी क्षमता, सुदृढ़ सीमा प्रबंधन, प्रभावी खुफिया तंत्र और दीर्घकालिक राष्ट्रीय सुरक्षा दृष्टि के साथ आगे बढ़ना होगा। यदि स्पेन की घटना से कोई सबसे बड़ा सबक मिलता है, तो वह यही है कि आधुनिक विश्व में राष्ट्रीय सुरक्षा केवल सीमा पर तैनात सैनिकों की जिम्मेदारी नहीं रह गई है; यह सुशासन, समाज, तकनीक, कूटनीति और निरंतर रणनीतिक तैयारी की साझा जिम्मेदारी बन चुकी है।

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