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Dharmendra Singh

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February 18, 2026

सच दिखाने की हिम्मत

अलगाववादी ताकतों के सङयंत्रों से सावधान रहना होगा …..
कर्नल देव आनंद लोहामरोड़
सुरक्षा विशेषज्ञ

“कश्मीर के लोग चिंता नहीं करें और यह नहीं सोचे कि आप अकेले हो, जरूरत पड़ी तो हम हस्तक्षेप करेंगे” – कमला हरीश( हारने वाली भारतीय मूल की डेमोक्रेटिक & लिबरल अमेरिकी राष्ट्रपति प्रत्याशी 2024)…

हाल ही में 7 नवंबर 2024 के दिन अमेरिका के राष्ट्रपति के चुनाव का नतीजा आना एवं जम्मू कश्मीर की नव निर्वाचित विधानसभा द्वारा धारा 370 को बहाल किए जाने का प्रस्ताव पारित किए जाने वाली ऐसी दो घटनाएं हैं जिनका असर सीधे तौर पर भारत की सुरक्षा, अखंडता एवं अस्मिता से देखा जाना चाहिए। 7 नवंबर 2024 केंद्र शासित जम्मू कश्मीर प्रदेश की नई सरकार ने धारा 370 बहाल किए जाने के पक्ष में प्रस्ताव पारित किया है यह जानते हुए कि भारत के सुप्रीम कोर्ट ने 5 अगस्त 2019 के 370 को निरस्त किए जाने की कार्रवाई पर मोहर लगा दी है। भारत की पार्लियामेंट द्वारा एक अस्थाई कानूनी प्रावधान को समाप्त किए जाने की कार्रवाई को भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने सही करार देते हुए सही ठहरने के बाद भी इस प्रकार का प्रस्ताव पारित किया जाना भारत के लिए चिंता का विषय बनता है।कानून के जानकार अपना अध्ययन जरूर कमला हैरिस की हार भारत के रणनीति कारों के लिए एक सुखद समाचार देखा जाना चाहिए। लेकिन उसी समय केंद्र शासित राज्य जम्मू कश्मीर की नवनिर्वाचित सरकार द्वारा धारा 370 को बहाल किए जाने का प्रस्ताव पारित किया जाना क्या पाकिस्तान एवं भारत विरोधीअलगाववादी ताकते के प्रभाव को हवा दे सकती है ? देश के सुरक्षा तंत्र एवं रणनीतिकार इस विषय को गंभीरता से ले रहे होंगे।

धारा 370 एवं 35A का इतिहास…..
जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 अक्टूबर 1949 में अस्तित्व में आया था, जिसके तहत उसे आंतरिक प्रशासन के लिए अस्थाई तौर पर स्वायत्तता दी गई थी। जिससे उसे वित्त, रक्षा, विदेशी मामले और संचार को छोड़कर सभी मामलों में अपने स्वयं के कानून बनाने की अनुमति मिलती थी। विशेष दर्जे के कारण जम्मू-कश्मीर राज्य पर संविधान की धारा 356 , 1976 का शहरी भूमि कानून , भारतीय संविधान की धारा 360 के तहत देश में वित्तीय आपातकाल लगाने का प्रावधान , आर. टी.आई. और सीएजी जैसे कानून लागू नहीं होते थे । जम्मू-कश्मीर के नागरिकों के पास दोहरी नागरिकता होती थी। जम्मू-कश्मीर का अलग राष्ट्रध्वज एवं संविधान था । जम्मू-कश्मीर की विधानसभा का कार्यकाल 6 वर्षों का होता था।
अनुच्छेद 35A, 14 मई 1954 को अनुच्छेद 370 में जोड़ा गया एक और प्रावधान है, जो राज्य के विधिनिर्माताओं को राज्य के स्थायी निवासियों के लिए विशेष अधिकार और सुविधाएं सुनिश्चित करने का अधिकार देता था जिसके अंतर्गत 1944 से पूर्व में रहने वाले लोगों को ही स्थानीय निवासी माना जाएगा एवं बाहरी लोगों को क्षेत्र में संपत्ति एवं अन्य कई अधिकारों से वंचित कर दिया गया था जैसे कि जो व्यक्ति स्थायी निवासी नहीं था वो राज्य में संपत्ति नहीं खरीद सकता था, सरकार की नौकरियों के लिए आवेदन नहीं कर सकता था, वहां के विश्विद्यालयों में दाखिला नहीं ले सकता था और न ही राज्य सरकार की कोई वित्तीय सहायता प्राप्त कर सकता था। जम्मू-कश्मीर की कोई महिला यदि भारत के किसी अन्य राज्य के व्यक्ति से विवाह कर ले लेती थी तो उस महिला की नागरिकता समाप्त हो जाती थी।

क्या अनुच्छेद 370 एवं 35 ए वापस लागू किया जा सकता है ?
जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 एवं 35a अब इतिहास बन चुका है और इसे दोबारा लागू नहीं किया जा सकता है। जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने के केंद्र सरकार के फैसले को 11 दिसंबर 2023 को सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों बेंच द्वारा वैध बताया जा चूका है। विशेष कर यह समझना होगा कि विधानसभा में प्रस्ताव पास करने के बाद भी केंद्रशासित प्रदेश को दोबारा लागू करने के लिए केंद्र सरकार और राष्ट्रपति की सहमति की जरूरत पड़ेगी। ऐसा अब राजनीतिक एवं सामाजिक तथा सुरक्षा कारणों से संभव नहीं है, भले ही केंद्र में सरकार किसी की हो। जो पार्टी अब अपनी राजनीतिक शक्ति का उपयोग कर संसद और राष्ट्रपति के जरिये इसे लागू करने की कोशिश करने वाली सरकार को देश के नागरिक स्वीकार नहीं करेंगे।

राष्ट्रीय सुरक्षा एवं भारत की अस्मिता से जुड़े मुद्दों पर राजनीति बंद होनी चाहिए: – 5 अगस्त 2019 में बीजेपी सरकार के फैसले के बाद जम्मू-कश्मीर के क्षेत्रीय राजनीतिक दलों नेशनल कॉन्फ्रेंस, पीडीपी के साथ कांग्रेस और गैर बीजेपी दलों ने विरोध जताया था। कांग्रेस ने कोर्ट के फैसले पर भी असहमति जताई थी। कांग्रेस नेता पी. चिदंबरम ने कहा था कि जिस तरीके से अनुच्छेद 370 को निरस्त किया गया उससे हम असहमत हैं। कांग्रेस के घोषणा पत्र में 370 को बहाल करने जैसी कोई भी चर्चा नहीं की तथा सिर्फ पूर्ण राज्य का दर्जा देने का वादा किया था। कांग्रेस अपने अल्पसंख्यक वोटरों के लिए इसका विरोध करती रहेगी। नेशनल कॉन्फ्रेंस और पीडीपी के लिए कश्मीर में अपने जनाधार बचाने के लिए राजनीतिक दांव ही है।

राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बदलते परिपेक्ष एवं समीकरणों के बीच में यह कहना गलत नहीं होगा कि भारत में अलगाववादी ताकतों को समर्थन नहीं मिलने वाला है । देश के नागरिकों को एकजुट रहते हुए विभाजनकारी एवं राष्ट्र विरोधी ताकतों को उचित जवाब देना होगा ।