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Dharmendra Singh

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April 3, 2026

सच दिखाने की हिम्मत

विशाल भौरासे रिपोर्टर

बारिश के समय चहुँओर बिखरी नयनाभिराम हरियाली को निहारते हुए कभी हमारे मन में आया कि ये पचास, सौ, दो सौ वर्ष पुराने वृक्ष किसने लगाये होंगे ? धरती का ये अनमोल श्रृंगार निश्चित ही हमारे पूर्वजों की थाती है । अगर हमारे पूर्वजों का प्रकृति की ओर देखने का दृष्टिकोण हमारी तरह लालची होता तो ये जंगल, नदियाँ, पहाड़ कब के समाप्त हो चुके होते ।
हम अपने पूर्वजों के प्रति कृतज्ञ हैं कि उन्होंने न केवल जंगल लगाये, अपितु उसे संरक्षित और संवर्धित करने के उपाय और मन्त्र अपनी आने वाली पीढ़ी को सौंप गये । प्रकृति संरक्षण के लिए वे हमें पर्वों की लम्बी श्रृंखला दे गये ।
यूँ तो सभी #हिन्दू_त्यौहार प्रकृति को ही समर्पित है । किन्तु वट सावित्री, आंवला नवमी, तुलसी विवाह, पीपल पूर्णिमा, छठ पूजा, गोवर्धन पूजा, हरियाली तीज, गंगा दशहरा, हरियाली अमावस्या, नागपंचमी आदि तो पूर्णतः प्रकृति संरक्षण और संवर्धन के पर्व है ।
ॐ द्यौ: शान्तिरन्तरिक्षँ शान्ति:,
पृथ्वी शान्तिराप: शान्तिरोषधय: शान्ति:।
वनस्पतय: शान्तिर्विश्वे देवा: शान्तिर्ब्रह्म शान्ति:,
सर्वँ शान्ति:, शान्तिरेव शान्ति:, सा मा शान्तिरेधि॥
ॐ शान्ति: शान्ति: शान्ति:॥
शास्त्रों में पृथ्वी, आकाश, जल, वनस्पति एवं औषधि को शांत रखने को कहा गया है। इसका आशय यह है कि इन्हें प्रदूषण से बचाया जाए । यदि ये सब संरक्षित व सुरक्षित होंगे तभी हमारा जीवन भी सुरक्षित व सुखी रह सकेगा।
हमारे पूर्वज ऋषि जानते थे कि पृथ्वी का आधार जल और जंगल है । इसलिए उन्होंने पृथ्वी की रक्षा के लिए वृक्ष और जल को महत्वपूर्ण मानते हुए कहा है,
‘वृक्षाद् वर्षति पर्जन्य: पर्जन्यादन्न सम्भव:’ अर्थात् वृक्ष जल है, जल अन्न है, अन्न जीवन है ।
जंगल को हमारे ऋषि आनन्ददायक कहते हैं ।
‘अरण्यं ते पृथिवी स्योनमस्तु’
यही कारण है कि हिन्दू जीवन के चार महत्वपूर्ण आश्रमों में से ब्रह्मचर्य, वानप्रस्थ और सन्यास का सीधा सम्बन्ध वनों से ही है ।
महाभारत का अनुशासन पर्व तो प्रकृति संरक्षण से भरा हुआ है ।
तस्मात् तडागे सद्वृक्षा रोप्याः श्रेयोऽर्थिना सदा।
पुत्रवत् परिपाल्याश्च पुत्रास्ते धर्मतः स्मृताः।।
(कल्याण की इच्छा रखने वाले व्यक्ति को तालाब के पास अच्छे पेड़ लगाने चाहिए और पुत्र की तरह उनकी देखभाल करनी चाहिए। वास्तव में धर्म के अनुसार वृक्षों को ही पुत्र माना गया है।)
तडागकृत् वृक्षरोपी इष्टयज्ञश्च यो द्विजः ।
एते स्वर्गे महीयन्ते ये चान्ये सत्यवादिनः ॥
(तालाब बनवाने, वृक्षारोपण करने, अैर यज्ञ का अनुष्ठान करने वाले द्विज को स्वर्ग में महत्ता दी जाती है । इसके अतिरिक्त सत्य बोलने वालों को भी महत्व मिलता है ।)
पुष्पिताः फलवन्तश्च तर्पयन्तीह मानवान् ।
वृक्षदं पुत्रवत् वृक्षास्तारयन्ति परत्र च ॥
(फलों और फूलों वाले वृक्ष मनुष्यों को तृप्त करते हैं । वृक्ष देने वाले अर्थात् समाजहित में वृक्षारोपण करने वाले व्यक्ति का परलोक में तारण भी वृक्ष करते हैं ।)
हरियाली अमावस्या भी प्रकृति को समर्पित पर्व है । इस दिन सम्पूर्ण चराचर जगत के देव भगवान शिव का पूजन-अर्चन करने के बाद शुभ मुहूर्त में वृक्षों को रोपा जाता है । इसके तहत शास्त्रों में विशेषकर आम, आंवला, पीपल, वटवृक्ष और नीम के पौधों को रोपने का विशेष महत्व है।
तो आइये ! अपने पूर्वजों के मार्ग का अनुसरण करते हुए प्रकृति संरक्षण के इस महापर्व हरियाली अमावस्या पर अपने-अपने सामर्थ्य अनुसार पौधारोपण कर उसे वृक्ष बनाने का संकल्प लेकर हरियाली के विस्तार में अपना योगदान सुनिश्चित करें ।
– मोहन नागर
बैतूल के मित्रों हेतु सूचना है कि इस वर्ष हरियाली अमावस्या (28 जुलाई 2022) पर प्रातः 9 बजे पौधारोपण का विस्तृत आयोजन ग्राम पाढर की शिव मन्दिर पहाड़ी पर होगा । जहाँ वर्षभर ग्राम बजरवाड़ा व आसपास के ग्रामीण श्रमदानियों ने वर्षाजल संरक्षण हेतु पहाड़ी पर खंतियाँ खोदकर पौधे लगाने हेतु पूर्व से स्थान निश्चित किया है ।