Chief Editor

Dharmendra Singh

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February 2026
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February 4, 2026

सच दिखाने की हिम्मत

शकील खान रिपोर्टर

मनावर विधानसभा क्षेत्र के खंडलाई से वाहन रेली के माध्यम से तेमरिया बोरलाई से चिराखान तक वाहन रेली के माध्यम से जयस प्रदेश अध्यक्ष लालसिंह बर्मन जी के नेतृत्व में भगवान टंटिया भील कि सहादत दिवस बड़ी धूमधाम से मनाया गया सभा का आयोजन किया गया जिसमे जयस प्रदेश अध्यक्ष ने मुख्यमंत्री शिवराजसिंह का धन्यवाद दिया की आपने पैसा ऐक्ट लागू किया लेकिन अभी भी पैसा ऐक्ट पूर्ण तरीके से लागू नही किया हे उसे पूर्ण तरीके से लागू करे ताकि हमारे आदिवासियो को सही से अधिकार मिले ताकि आदिवासियो का उद्धार हो सके साथ हीं तीर कमान प्रतियोगिता का आयोजन भी किया गया था जिसमे प्रथम पुरस्कार 2121 द्वितीय पुरस्कार 1111 एवम् तृतीय पुरस्कार 555 रखा गया था हमारे भगवान
जिन्होंने सन’1857 में ब्रिटिश शासन के खिलाफ विद्रोह किया था ,, मध्यप्रदेश के एक ऐसे ही जननायक भगवान क्रन्तिकारी टंट्या भील जिन्होंने अंग्रेजों को घुटने टेकने के लिए मजबूर कर दिया ,था,,
टंट्या भील के सामने ब्रिटिश शासन की ईंट से ईंट बज गए थी ,, मालवा की माटी से लेकर , निमाड़ के हर घने जंगल के ज्ञाता कहे जाने वाले टंट्या भील के सामने अंग्रेजों के सिपाहियों की कोई औकात नही थी कि टंट्या भील को पकड़ सकें,,
टंट्या भील एक ऐसे सख्त थे ,, जिन्होंने एक दिन में 1500 सो से 2000 हजार तक सभाए की थी या कर सकते थे,,,,
अंग्रेजी हुकूमत टंट्या भील के नाम से ही थर थर काँपते थे,, उनको हर पल यह डर सताया करता था कि कहि टंट्या भील इधर से या उधर से तो नही आ रहा है ,,
भगवान क्रांतिकारी टंट्या भील की इतनी दसियत थी कि उनके एरिये में या उनके आस पास के राज्य के लोग भी उनके नाम से चोरियां ,, या ,, डकैती तक करना छोड़ देते थे,, उनको भी यह डर था ,, की टंट्या भील के सामने हमारी कोई ओकात नही ,, डाकुओं के लिए डाकू ,, चोरो के लिए चोर ,, सवकारो के लिए साहूकार साबित होते थे ,, टंट्या भील अपने माथे पर गोफन हाथ मे बंदूक लेके चलते थे ,,
एक दिन ने 700 सौ से 800 सौ किलोमीटर तक उनका घूमना फिरना होता था ,,
उनकी चाल सुनते ही लोगो को डर लगने लगे जाता था ,,
टंट्या भील की चाल के हिसाब से भी प्रकृति भी अपना रुख बदल लेती थी ,, वह भी टंट्या भील की चाल के हिसाब से उनजे साथ चलती थी ,,
टंट्या भील ने कभी भी गरीब असहाय लोगों को परेशान नही किया ,,
राजा महाराजा भी उनके नाम से काँपते थे ,,
राजाओं के महल में जो रखा धन टंट्या भील रातो रात लूट लिया करते थे,, ओर उस धन को गरीब असहाय लोगों में बाट दिया करते थे,,
लोग उनको दया की मूर्ति कहकर पुकारते थे,, ,,
आदिवासी समुदाय में जन्मे 1840/42 खंडवा इंदौर जिले में ओर मत्यु -1890 में जबलपुर के जेल में फांसी की सजा या आज तक किसी को भी नही मालूम कि उनकी मित्यु कैसे हुई ,,
उनकी लाश पातालपानी महू इंदौर ,,में दफनाई गई ,, या ,, जलाई गई ,,
आज भी उनकी समाधि पातालपानी पर उनकी समाधि स्थल पर ट्रेन रुककर सलामी देती हैं ,,
वरना पातालपानी के जंगल को पार भी नही कर पाती हैं,,कहते हैं टंट्या भील की मित्यु का कारण उनकी मुँह बोली बहन ओर उनके जियाजी ही हैं ,, जब वे राखी बंधवाने अपनी बहन के घर गए तभी उनको वहां धर दबोज लिया गया ,,
ओर वहां से सीधा अंग्रेजों के आदेशानुसार उन्हें जबलपुर के जेल में भेज दिया गया ,, वहां से सीधा उनकी लास ही पातालपानी के समीप जंगलों में पाई गई ,, जहा उनकी लाश को दफनाया या जलाया गया ,,
अंग्रेज आज भी इंग्लैंड में टंट्या भील को रोबिनहुड़ के नाम से ही पुकारती है ,, अंग्रेजों के हर वक्त ये डर सताया करता था कि आदिवासी भगवान टंट्या भील पलक झपकते गायप ,, हो जाते ते ,,आंख खोलते उनकी आंखों के सामने होते थे,, कई बार अंग्रेजों ने टंट्या भील को बंदूक की गोली से छन्नी छन्नी कर दिया था ,, फिर भी टंट्या भील का एक बाल तक नही उखाड़ सके थे,, आज भी टंट्या भील को क्रन्तिकारी भगवान कहते है उनके वंशज ,, उनकी पूजा करते हैं ,,
उनकी समाधि पातालपानी ने उनके सिर गाते को आज भी लोग पूजा अर्चना करते हैं ,, ओर अपनी मनोकामना पूर्ण करते हैं ,,
. उपस्थित कैलाश राणा रीना मौर्य शरद कनेल, मोंटी राणा, राहुल भवेल, सुखदेव सोलंकी, हरेसिंह मुवेल , गजेंद्र भवेल, गलसिह भवेल, देवा भाभर, प्रदीप वास्केल, गुलाब सिह मेड़ा,सुनील कनेल जगदीश बुंदेला छोटू दरबार , सेठी दादा खंडलाई कैलाश डोडवे, संतोष चौहान कालू सोलंकी चिराखान वीरेन किराड़े, अजय मौर्य, संतोष अचाले संजय निगवाल, संतोष नर्गेश महेश सोलंकी , शिवा मुवेल मुकेश सोलंकी नंदराम आचाले रही भाबर व आदि समाज जन व जयस कार्यकर्ता उपस्थित थे